इस्लाम में कुल छह (6) कलमे माने जाते हैं, पाँच नहीं।
इस्लाम में कलमों की संख्या का यथार्थ
पारंपरिक रूप से इस्लामिक बयानों, तालीम और मकतबों (प्रारंभिक धार्मिक स्कूलों) में बच्चों को शुरुआत से ही छह कलमे पढ़ाए और याद कराए जाते हैं।
हालाँकि, ध्यान देने योग्य बात यह है कि कुरआन मजीद या किसी एक हदीस की किताब में एक साथ "छह कलमों" की कोई विशेष सूची एक ही क्रम में नहीं दी गई है। ये छह अलग-अलग दुआओं औरikr (स्मरण) के वाक्यों का एक संकलन हैं, जिन्हें बाद के इस्लामी विद्वानों ने आम मुसलमानों, खासकर नौजवानों और बच्चों को इस्लाम के मूल सिद्धांतों को आसानी से याद करवाने के लिए 'छह कलमा' के रूप में व्यवस्थित किया था।
छह कलमों के नाम और उनका संक्षिप्त परिचय
इस्लाम में जिन छह कलमों को मान्यता प्राप्त है, उनके नाम निम्नलिखित हैं:
पहला कलमा तय्यब (Kalima Tayyab): यह इस्लाम का सबसे बुनियादी और मुख्य कलमा है।
इसमें अल्लाह की एकता और हज़रत मुहम्मद (स.) के पैगंबर होने की गवाही दी जाती है। दूसरा कलमा शहादत (Kalima Shahadat): इसमें गवाही के शब्दों को दोहराया जाता है कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद (स.) उसके बंदे और रसूल हैं।
तीसरा कलमा तमजीद (Kalima Tamjeed): इसमें अल्लाह की पवित्रता (सुब्हानल्लाह), उसकी तारीफ और उसकी महानता का बखान किया जाता है।
चौथा कलमा तौहीद (Kalima Tauheed): यह कलमा पूरी तरह से अल्लाह की बादशाहत, उसकी وحدانیت (एकता) और उसकी ताक़त को समर्पित है।
पाँचवाँ कलमा इस्तिग़फ़ार (Kalima Istigfar): यह अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने और तौबा करने का कलमा है।
छठा कलमा रद्दे कुफ्र (Kalima Radde Kufr): यह अनजाने में या जानबूझकर शिर्क और कुफ्र जैसी बुराइयों से बचने और अपने ईमान को तरोताज़ा रखने की एक दुआ है।
(नोट: इस लेख के अगले भाग में हम प्रत्येक कलमे के अरबी पाठ, उसके हिंदी उच्चारण और विस्तृत अर्थ पर चर्चा करेंगे।)
क्या आप इस लेख के दूसरे भाग को पढ़ना चाहते हैं जिसमें सभी छह कलमों का हिंदी अनुवाद और उनका महत्व विस्तार से बताया गया हो?
इस्लाम में 6 कलमे: महत्व और निष्कर्ष (दूसरा और अंतिम भाग)
तीसरे से छठे कलमे का परिचय और तफ़सील
इस्लाम धर्म में बुनियादी तौर पर छह (6) कलिमे प्रमाणित और प्रचलित हैं, जिनमें शुरुआती दो कलमे (कलिमा-ए-तय्यबा और कलिमा-ए-शहादत) सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और हर मुसलमान को जुबानी याद होते हैं।
तीसरा कलमा (तमजीद): यह अल्लाह की पवित्रता (सुब्हानल्लाह), उसकी तारीफ और उसकी अजमत का इकरार करता है।
चौथा कलमा (तौहीद): यह अल्लाह की एकता, उसकी बादशाहत, जीवन और मृत्यु पर उसके अधिकार का सबसे बेहतरीन और विस्तृत बयान है।
पाँचवा कलमा (इस्तिग़फ़ार): इसके जरिए इंसान अपने गुनाहों की माफी अल्लाह से मांगता है और अनजाने या जानबूझकर हुई गलतियों पर तौबा करता है।
छठा कलमा (रद्दे कुफ्र): यह कुफ्र, शिर्क और तमाम बुरे कर्मों से बेजारी (किनाराकशी) का ऐलान है और दोबारा ईमान पर पुख्ता रहने की गवाही देता है।
5 या 6 की उलझन का समाधान
अक्सर यह सवाल उठता है कि कलिमे 5 हैं या 6?
विशेष नोट: इन सभी कलिमों का मुख्य उद्देश्य एक मुसलमान के दिल में अल्लाह की وحدانيّت (एकता) और हज़रत मुहम्मद (सallallahu alaihi wasallam) की रिसालत को अटूट रूप से बिठाना है।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जाए तो, संख्या चाहे 5 कही जाए या 6, इन सभी का मूल सार इस्लाम के बुनियादी स्तंभों (तौहीद और रिसालत) की हिफाजत करना है।
क्या आप इन सभी छह कलमों के अरबी पाठ और उनके हिंदी तर्जुमे (अर्थ) के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं?
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