भारत में एक आम नागरिक के लिए AK 47 खरीदना पूरी तरह से गैरकानूनी है, इसलिए वैध बाजार में इसकी कोई तय कीमत नहीं है। हालांकि, भारतीय सुरक्षा बलों, सेना और विशेष कमांडो दस्तों के लिए सरकार द्वारा रक्षा सौदों के तहत इसे थोक में खरीदा जाता है, जहां एक राइफल की कीमत लगभग 25,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये के बीच बैठती है। इसके विपरीत, अवैध हथियारों के काले बाजार या अंडरवर्ल्ड में इसकी कीमत मांग और तस्करी के रास्तों के आधार पर 2 लाख रुपये से लेकर 5 लाख रुपये या उससे भी अधिक तक पहुंच सकती है।

इतिहास की नजर से: मिखाइल कलाश्निकोव का वो अविष्कार जिसने दुनिया बदल दी

सन् 1947 में सोवियत संघ के एक साधारण सैनिक मिखाइल कलाश्निकोव ने एक ऐसा ढांचा तैयार किया जिसने युद्ध के तौर-तरीकों को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। अवतोरमत कलाश्निकोवा 1947, जिसे दुनिया आज अमूमन AK 47 के नाम से जानती है, अपनी बेजोड़ सादगी और अचूक मारक क्षमता के लिए मशहूर है। कीचड़ में गिर जाए, पानी में डूब जाए या रेगिस्तान की धूल से सन जाए, यह राइफल कभी जाम नहीं होती। यही वजह है कि दुनिया भर की सेनाओं से लेकर उग्रवादी संगठनों तक, हर कोई इस हथियार का दीवाना रहा है। भारत में इस हथियार का प्रवेश अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक की शुरुआत में हुआ, जब सीमा पार से घुसपैठ और आतंकवाद ने सिर उठाना शुरू किया। इसके बाद भारतीय सुरक्षा बलों को भी इस बात का अहसास हुआ कि पारंपरिक बोल्ट-एक्शन राइफलों के भरोसे आधुनिक दौर की लड़ाइयां नहीं जीती जा सकतीं। परिणामस्वरूप, भारतीय सेना और राज्य पुलिस बलों ने अपने बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए इस घातक हथियार के विभिन्न संस्करणों को अपनाना शुरू कर दिया।

लागत का गणित: सरकारी रक्षा सौदे बनाम अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया

जब हम कीमत की बात करते हैं, तो हमें दो बिल्कुल अलग-अलग दुनियाओं को समझना होगा जो समानांतर चलती हैं। पहली दुनिया है आधिकारिक रक्षा खरीद की, जहां भारत सरकार रूस या अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ सीधे तौर पर सरकारी स्तर (G2G) पर समझौते करती है। इन बड़े रक्षा करारों में प्रति इकाई लागत बेहद कम आती है क्योंकि ऑर्डर लाखों की संख्या में होते हैं। हाल के वर्षों में भारत ने रूस के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश के कोरवा में AK 203 राइफलों के निर्माण का कारखाना भी स्थापित किया है, जो इसी परिवार का एक बेहद आधुनिक रूप है। दूसरी तरफ, ब्लैक मार्केट का गणित बिल्कुल जुदा और खौफनाक है। वहां कीमत इस बात से तय नहीं होती कि लोहा और मैकेनिज्म कितने का है, बल्कि इस बात से तय होती है कि उस हथियार को सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचाकर सरहद पार कैसे लाया गया। उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों या बड़े महानगरों के अंडरवर्ल्ड में एक चालू हालत वाली एके-47 की कीमत आसमान छूती है, क्योंकि इसके साथ जुड़ा जोखिम और इसकी मारक क्षमता का खौफ ही इसकी असली कीमत तय करता है।

कानूनी दीवार: भारतीय शस्त्र अधिनियम और आम नागरिकों के लिए सख्त पाबंदी

भारत का शस्त्र अधिनियम (Arms Act, 1959) बेहद कड़ा है और यह नागरिकों को हथियारों की उपलब्धता के मामले में दो स्पष्ट श्रेणियों में बांटता है - प्रतिबंधित बोर (Prohibited Bore) और गैर-प्रतिबंधित बोर (Non-Prohibited Bore)। AK 47 पूरी तरह से एक स्वचालित (फुल्ली ऑटोमैटिक) मिलिट्री-ग्रेड हथियार है, जो प्रतिबंधित बोर की श्रेणी में आता है। इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि भारत का कोई भी आम नागरिक, चाहे वह कितना भी रसूखदार या अमीर क्यों न हो, कानूनी रूप से इस राइफल को न तो खरीद सकता है और न ही अपने पास रख सकता है। इसका लाइसेंस केवल और केवल सेना, अर्धसैनिक बलों और राज्य के पुलिस विभागों को ही जारी किया जा सकता है। यदि कोई नागरिक इस हथियार के साथ पकड़ा जाता है, तो उस पर टाडा या यूएपीए जैसे गंभीर आतंकवाद-विरोधी कानून और शस्त्र अधिनियम की गैर-जमानती धाराएं लागू होती हैं, जिसमें आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

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