जब हम इस बुनियादी सवाल पर आते हैं कि कुरान के लेखक कौन हैं, तो इसका सीधा, बिना किसी लाग-लपेट वाला जवाब यह है कि इस्लामी मान्यता के अनुसार इसका कोई इंसानी लेखक नहीं है। मुसलमान दृढ़ता से मानते हैं कि यह अल्लाह (ईश्वर) का साक्षात कलाम यानी शब्द है, जिसे पैगंबर मोहम्मद पर जिब्रील नामक फरिश्ते के जरिए नाजिल यानी अवतरित किया गया था। हालांकि, इतिहासकारों, भाषाविदों और गैर-मुस्लिम विचारकों ने इस पर अलग-अलग नजरिए पेश किए हैं, जिससे यह विमर्श और भी गहरा हो जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, रूहानी बुनियाद और वही का सिलसिला

सातवीं सदी के अरब समाज में जहाँ केवल जुबानी परंपराओं का बोलबाला था, वहाँ एक ऐसी किताब का उभरना जिसने पूरी दुनिया की तकदीर बदल दी, अपने आप में एक अनोखी घटना थी। इस्लामी अकीदे के मुताबिक, सन 610 ईस्वी में मक्का की हीरा गुफा में ध्यानमग्न पैगंबर मोहम्मद साहब के पास पहली 'वही' यानी ईश्वरीय संदेश आया था। यह सिलसिला अगले 23 साल तक, यानी उनकी वफात तक लगातार चलता रहा।

यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि पैगंबर मोहम्मद साहब खुद 'उम्मी' यानी अनपढ़ थे। उन्होंने कभी कोई औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी और न ही उन्हें लिखना-पढ़ना आता था। अरब के तपते रेगिस्तान में जब भी कोई आयत नाजिल होती, तो पैगंबर साहब उसे अपने साथियों (सहाबा) को सुनाते थे। उस दौर में कागज की किल्लत थी, इसलिए इन आयतों को ऊंट की हड्डियों, खजूर के पत्तों, चमड़े के टुकड़ों और सफेद पत्थरों पर तुरंत लिख लिया जाता था। इसके साथ ही, सैकड़ों सहाबा ऐसे थे जिन्होंने पूरे कलाम को अपने सीने में महफूज कर लिया, जिन्हें 'हाफिज' कहा जाता है। इस तरह, मौखिक और लिखित दोनों परंपराओं ने मिलकर इस किताब की बुनियाद को पूरी तरह महफूज रखा।

भाषाई चमत्कार, साहित्यिक विशिष्टता और अकादमिक विश्लेषण

कुरान की साहित्यिक बुनावट और उसकी शब्दावली को समझने के लिए तत्कालीन अरब समाज के साहित्यिक स्तर को जानना बेहद जरूरी है। उस जमाने के अरब लोग अपनी फसाहत और बलागत यानी भाषा की वक्तृत्व कला और काव्यात्मक श्रेष्ठता पर बेहद गुरूर करते थे। उनके बड़े-बड़े कवि मक्का के उकाज मेले में अपनी रचनाओं का प्रदर्शन करते थे। लेकिन जब कुरान की आयतें उनके सामने आईं, तो अरब के नामी-गिरामी शायर और भाषाविद भी दंग रह गए।

यह न तो पारंपरिक अरबी कविता थी और न ही आम गद्य। इसकी बहर, इसका संगीत और इसकी रवानगी इतनी बेजोड़ थी कि इंसानी दिमाग चकरा गया। कुरान ने खुद उस दौर के आलोचकों को एक खुली चुनौती दी कि अगर तुम्हें लगता है कि यह किसी इंसान की रचना है, तो इसके जैसी महज एक सूरा (अध्याय) ही बनाकर दिखा दो। इतिहास गवाह है कि उस दौर का कोई भी धुरंधर इस चुनौती का सामना नहीं कर सका। पश्चिमी इतिहासकारों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि अरबी भाषा के पूरे इतिहास में कुरान जैसी मुकम्मल, लयबद्ध और प्रभावशाली कृति न तो पहले कभी देखी गई और न ही बाद में कभी लिखी जा सकी। इसका यह बेजोड़ स्वरूप ही इसके दिव्य होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।

समकालीन समाज पर प्रभाव और इसके व्यावहारिक निहितार्थ

इस अद्भुत ग्रंथ के अवतरण ने तत्कालीन अरब की सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक व्यवस्था में एक अभूतपूर्व क्रांति ला दी। सदियों से आपस में कत्लेआम करने वाले कबीले, जो छोटी-छोटी बातों पर नस्लों तक दुश्मनी निभाते थे, वे एक झटके में एक झंडे के नीचे आ गए। इस किताब ने न केवल लोगों की रूहानी जिंदगी को बदला, बल्कि एक मुकम्मल कानूनी और सामाजिक ढांचा भी तैयार किया, जिसने आने वाले समय में एक विशाल साम्राज्य की नींव रखी।

व्यावहारिक धरातल पर देखें तो इस ग्रंथ की प्रामाणिकता और इसके संकलन की प्रक्रिया ने इतिहास लेखन को एक नया नजरिया दिया। पहली बार किसी धार्मिक संदेश को अक्षरों में इस तरह सहेजा गया कि उसमें एक नुक्ते का भी हेर-फेर होना नामुमकिन हो गया। मक्का और मदीना के दो अलग-अलग कालखंडों में नाजिल हुए इन संदेशों ने इंसानी हुकूक, औरतों के अधिकार, व्यापारिक नियम और युद्ध के सिद्धांतों को इतनी बारीकी से परिभाषित किया कि वह आज चौदह सौ साल बाद भी उतना ही प्रासंगिक नजर आता है। यही वजह है कि इसका अध्ययन केवल एक धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के सबसे बड़े औजार के रूप में किया जाता है।