सन् 1980 के दशक में जब अमेरिका ने भारत को मौसम पूर्वानुमान के लिए अपना 'क्र्रे' (Cray) सुपरकंप्यूटर बेचने से साफ इनकार कर दिया, तो दुनिया को लगा कि भारतीय विज्ञान घुटने टेक देगा। लेकिन पश्चिम की इस हेकड़ी का जवाब भारत ने आत्मनिर्भरता से दिया। भारत का पहला सुपरकंप्यूटर, जिसे हम PARAM 8000 के नाम से जानते हैं, आधिकारिक तौर पर 1 जुलाई 1991 को बनकर तैयार हुआ था। इस महासंगणक के निर्माण ने वैश्विक मंच पर भारत की तकनीकी संप्रभुता की एक ऐसी नई इबारत लिखी, जिसने दुनिया के बड़े-बड़े विकसित देशों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया।

प्रतिबंधों की आग से उपजा स्वदेशी संकल्प: परम 8000 की पृष्ठभूमि

बात उस दौर की है जब शीतयुद्ध की कड़वाहट दुनिया के समीकरण तय कर रही थी। भारत को कृषि और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक बेहद शक्तिशाली कंप्यूटर की दरकार थी। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने अमेरिका से 'क्र्रे-XMP' सुपरकंप्यूटर खरीदने की हरसंभव कोशिश की, मगर वाशिंगटन प्रशासन को डर था कि भारत इसका इस्तेमाल परमाणु हथियारों के विकास में कर सकता है। इस कूटनीतिक गतिरोध ने भारतीय वैज्ञानिकों के आत्मसम्मान को झकझोर कर रख दिया।

नतीजतन, 1988 में 'सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग' (C-DAC) की स्थापना की गई। इस नवगठित संस्थान को तीन साल का समय और लगभग 30 करोड़ रुपये का बजट दिया गया—यह वही रकम थी जो अमेरिका को उस समय क्र्रे कंप्यूटर के लिए दी जा रही थी। डॉ. विजय भटकर के नेतृत्व में युवा इंजीनियरों की एक टोली ने पुणे की प्रयोगशालाओं में दिन-रात एक कर दिया। पश्चिम की पाबंदियां दरअसल हमारे लिए एक वरदान साबित हुईं, जिसने हमें आयात पर निर्भर रहने के बजाय खुद का रास्ता तलाशने के लिए मजबूर किया।

समानांतर प्रसंस्करण की शक्ति: कैसे काम करता था यह महासंगणक?

परम 8000 की वास्तुकला (Architecture) अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम थी। उस दौर के पारंपरिक सुपरकंप्यूटर एक समय में एक ही जटिल गणना को अंजाम देते थे, जिसे 'सीक्वेंटियल प्रोसेसिंग' कहा जाता था। भारतीय वैज्ञानिकों ने इस लीक से हटकर एक बिल्कुल नया दृष्टिकोण अपनाया, जिसे पैरेलल प्रोसेसिंग (समानांतर प्रसंस्करण) कहा जाता है। आइए समझते हैं कि यह तकनीक चरण-दर-चरण कैसे काम करती थी:

सबसे पहले, किसी भी विशाल और पेचीदा गणितीय समस्या को छोटे-छोटे सैकड़ों हिस्सों में तोड़ दिया जाता था। इसके बाद, इन हिस्सों को एक साथ प्रोसेस करने के लिए कंप्यूटर के भीतर एक विशाल नेटवर्क बनाया गया। परम 8000 में कुल 64 'इनमॉस टी800 ट्रांसप्यूटर' (Inmos T800 Transputers) माइक्रोप्रोसेसर लगाए गए थे। ये सभी प्रोसेसर आपस में एक जाल की तरह जुड़े थे।

अंतिम चरण में, ये सभी 64 प्रोसेसर एक ही समय में, समानांतर रूप से अपने-अपने हिस्से की गणना करते थे। जब सभी प्रोसेसर अपनी गणना पूरी कर लेते, तो एक मुख्य नियंत्रण प्रणाली इन सारे परिणामों को आपस में जोड़कर अंतिम सटीक नतीजा दे देती थी। इस अद्भुत तालमेल की बदौलत परम 8000 की रफ्तार 1 गीगाफ्लॉप (Gigaflop) तक पहुंच गई, जो उस समय के लिहाज से एक अविश्वसनीय गति थी।

मौसम विज्ञान में क्रांति: परम 8000 का एक व्यावहारिक उदाहरण

परम 8000 की असली परीक्षा तब हुई जब इसका इस्तेमाल भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा मानसून की भविष्यवाणी के लिए किया गया। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए मानसून का सही समय पर सटीक अनुमान लगाना जीवन-मरण का प्रश्न होता है। जब इस स्वदेशी सुपरकंप्यूटर को हवा के दबाव, समुद्र के तापमान और बादलों की आवाजाही से जुड़े लाखों जटिल समीकरण सौंपे गए, तो इसके नतीजों ने सबको चौंका दिया।

पहले जिस मौसम के डेटा को विश्लेषित करने में सामान्य कंप्यूटरों को हफ्तों का समय लग जाता था और तब तक मौसम बदल चुका होता था, परम 8000 ने उसी विशाल डेटा को महज कुछ घंटों में प्रोसेस करके सटीक पूर्वानुमान जारी कर दिया। इस सफलता से न केवल देश के करोड़ों किसानों को बुआई का सही समय पता चला, बल्कि देश के नीति-निर्माताओं को भी यह समझ आ गया कि सुपरकंप्यूटिंग का स्वदेशी मॉडल भारत के आर्थिक विकास की रीढ़ बनने की पूरी क्षमता रखता है।

विशेषज्ञों की राय (What Experts Say)

कंप्यूटर विज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि परम 8000 (Param 8000) का निर्माण केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के अनुसार, जब 1980 के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका ने भारत को क्र्रे (Cray) सुपरकंप्यूटर देने से इनकार कर दिया, तो उसने अनजाने में भारत के भीतर एक सोई हुई शक्ति को जगा दिया। सी-डैक (C-DAC) के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. विजय भटकर के नेतृत्व में भारतीय इंजीनियरों ने बेहद कम बजट और सीमित समय में इस चुनौती को स्वीकार किया। विशेषज्ञों का कहना है कि परम 8000 में इस्तेमाल की गई समानांतर प्रसंस्करण (Parallel Processing) तकनीक उस समय बेहद क्रांतिकारी थी। आज के विश्लेषक मानते हैं कि यदि भारत ने 1991 में यह कदम न उठाया होता, तो आज हम अंतरिक्ष अनुसंधान, मौसम पूर्वानुमान और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनने से चूक जाते।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: भारत को अपना पहला सुपरकंप्यूटर खुद क्यों बनाना पड़ा?

1980 के दशक में भारत को मौसम के सटीक पूर्वानुमान और शैक्षणिक शोध के लिए अमेरिकी सुपरकंप्यूटर 'क्र्रे' की आवश्यकता थी। हालांकि, अमेरिका को यह डर था कि भारत इस तकनीक का उपयोग सैन्य या परमाणु हथियारों के विकास में कर सकता है, इसलिए उन्होंने भारत को यह सुपरकंप्यूटर बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस तकनीकी नाकेबंदी के बाद भारत सरकार ने स्वदेशी तकनीक विकसित करने का निर्णय लिया और 1988 में सी-डैक की स्थापना की, जिसके परिणामस्वरूप 1991 में 'परम 8000' बनकर तैयार हुआ।

प्रश्न 2: परम 8000 की मुख्य विशेषताएं और इसकी गति क्या थी?

परम 8000 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ओपन आर्किटेक्चर और समानांतर प्रसंस्करण क्षमता थी, जिसमें कई माइक्रोप्रोसेसर एक साथ मिलकर काम करते थे। इसकी गणना करने की गति 1 गिफ्लॉप्स (Gigaflops) यानी 1 अरब गणनाएं प्रति सेकंड थी। यह उस समय के कई महंगे पश्चिमी सुपरकंप्यूटरों के बराबर थी, लेकिन इसकी लागत उनकी तुलना में महज एक अंश थी, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था।

एक विचारणीय सवाल

आज जब दुनिया क्वांटम कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एक नए युग में प्रवेश कर रही है, और भारत सुपरकंप्यूटिंग के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, तो क्या हम आने वाले समय में पश्चिमी देशों पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह खत्म करके दुनिया की सबसे पहली 'क्वांटम सुपरपावर' बन पाएंगे?