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दुनिया के नक्शे पर जब 1971 में एक नया इतिहास लिखा जा रहा था, तब संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े को रोकने के लिए एक महाशक्ति चुपचाप परमाणु पनडुब्बियों के साथ हिंद महासागर में आ खड़ी हुई थी। वह देश कोई और नहीं, बल्कि रूस है। आज भी जब आम भारतीयों से पूछा जाता है कि भारत का सबसे पक्का दोस्त कौन है, तो जुबां पर सबसे पहला नाम रूस का ही आता है। हालांकि, आधुनिक दौर में फ्रांस और इजरायल भी रणनीतिक रूप से इस कतार में बहुत मजबूती से खड़े दिखाई देते हैं।
दोस्ती की ऐतिहासिक बुनियाद और सोवियत संघ का अटूट साथ
भारत और रूस के बीच के रिश्ते केवल आज की कूटनीति का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें शीत युद्ध के उस दौर में छिपी हैं जब पूरी दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई थी। 1947 में आजादी मिलने के तुरंत बाद, भारत ने किसी भी गुट में शामिल न होने का फैसला किया, जिसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन कहा गया। इस मुश्किल दौर में, जब पश्चिमी देश पाकिस्तान की तरफ झुकाव दिखा रहे थे, तब सोवियत संघ (आज का रूस) ने भारत का हाथ थामा। 1971 की भारत-सोवियत शांति, मैत्री और सहयोग संधि ने दोनों देशों के बीच एक ऐसा रक्षा कवच तैयार किया, जिसने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। कश्मीर के संवेदनशील मुद्दे पर जब भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत को घेरने की कोशिश की गई, रूस ने अपने 'वीटो' पावर का इस्तेमाल करके हर बार भारत के हितों की रक्षा की। यह एक ऐसा ऐतिहासिक सच है जिसे कोई भी भारतीय कभी भुला नहीं सकता।
कूटनीतिक संतुलन और सामरिक साझेदारी की अंदरूनी कार्यप्रणाली
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी दोस्ती बिना ठोस रणनीतिक और सैन्य लेन-देन के जिंदा नहीं रह सकती। भारत और रूस की यह सदाबहार दोस्ती कई महत्वपूर्ण चरणों और प्रणालियों के माध्यम से काम करती है। सबसे पहला स्तंभ है सैन्य-तकनीकी सहयोग। भारत अपनी थल सेना, वायुसेना और नौसेना के लिए लगभग 60 से 70 प्रतिशत घातक हथियार और तकनीक रूस से ही हासिल करता आया है। दूसरी प्रणाली है साझा रक्षा उत्पादन, जिसमें दोनों देश सिर्फ खरीदार और विक्रेता नहीं हैं, बल्कि मिलकर आधुनिक हथियारों का निर्माण करते हैं। तीसरा सबसे बड़ा जरिया है ऊर्जा सुरक्षा। जब पश्चिमी देशों ने यूक्रेन संकट के बाद रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल का आयात किया। यह कदम दिखाता है कि भारत अपनी विदेश नीति को किसी बाहरी दबाव में आकर नहीं बदलता और संकट के समय अपने पुराने साथी के आर्थिक हितों को भी मजबूती देता है।
पोखरण परमाणु परीक्षण और प्रतिबंधों के दौर की एक जीती-जागती मिसाल
साल 1998 में जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था, तब अमेरिका और उसके सहयोगी यूरोपीय देशों ने भारत पर बेहद कड़े आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए थे। भारत को वैश्विक बिरादरी में अलग-थलग करने की पूरी कोशिश की गई थी। उस बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण समय में रूस ने भारत की संप्रभुता का सम्मान किया और किसी भी तरह के प्रतिबंध लगाने से साफ इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, रूस ने भारत के महत्वाकांक्षी कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण के लिए आवश्यक तकनीकी सहायता और ईंधन की आपूर्ति जारी रखी, जबकि अंतरराष्ट्रीय नियम इसके आड़े आ रहे थे। यह एक ऐसा ठोस उदाहरण है जो साबित करता है कि जब पूरी दुनिया भारत के खिलाफ खड़ी थी, तब रूस एक चट्टान की तरह भारत के विकास और सुरक्षा के साथ खड़ा रहा।
इस विषय पर विशेषज्ञों का क्या कहना है?
वैश्विक मामलों और कूटनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में किसी एक देश को भारत का सबसे अच्छा मित्र घोषित करना जल्दबाजी होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, रूस ने ऐतिहासिक रूप से हर मुश्किल समय में भारत का साथ दिया है, खासकर सुरक्षा और रक्षा के मामलों में। वहीं दूसरी ओर, आर्थिक प्रगति, तकनीकी सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन के लिए अमेरिका और जापान के साथ भारत के संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। कूटनीतिक विश्लेषक इस बात पर जोर देते हैं कि आधुनिक विदेश नीति भावनाओं से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है। आज का भारत किसी एक गुट पर निर्भर रहने के बजाय 'बहु-अलाइनमेंट' (multi-alignment) की नीति अपना रहा है, जहाँ वह अपनी संप्रभुता और आर्थिक विकास को सर्वोपरि रखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
क्या रूस आज भी भारत का सबसे भरोसेमंद साथी है?
हाँ, ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रूस भारत का एक बेहद विश्वसनीय मित्र रहा है। संयुक्त राष्ट्र में भारत का समर्थन करने से लेकर संकट के समय सैन्य उपकरणों की आपूर्ति करने तक, रूस ने हमेशा अपनी प्रतिबद्धता निभाई है। हालांकि, बदलते वैश्विक समीकरणों और रूस की अन्य देशों के साथ बढ़ती नजदीकियों के कारण, भारत अब अपने रक्षा और व्यापारिक साझेदारों का दायरा बढ़ा रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके।
बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और भारत के संबंध कितने महत्वपूर्ण हैं?
आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर अमेरिका वर्तमान में भारत के सबसे महत्वपूर्ण भागीदारों में से एक है। व्यापार, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, और तकनीकी आदान-प्रदान के मामले में दोनों देश बहुत करीब आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में चीन के साथ कोई बड़ा भू-राजनीतिक तनाव पैदा होता है, तो अमेरिका और क्वाड (QUAD) देशों की भूमिका भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम साबित होगी।
एक विचारणीय प्रश्न
बदलती हुई दुनिया और नए बनते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को देखते हुए, क्या भारत को किसी एक देश पर 'सर्वश्रेष्ठ मित्र' का टैग लगाना चाहिए, या फिर 21वीं सदी की कूटनीति में केवल 'स्थायी हित' ही सबसे बड़े मार्गदर्शक होते हैं?
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