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क्या आप जानते हैं कि जिस ठोस जमीन पर हम खड़े हैं, उसके ठीक नीचे पिघले हुए पत्थरों का एक ऐसा धधकता हुआ समंदर है जो पूरी पृथ्वी के आयतन का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा घेर कर बैठा है? जब हम पृथ्वी की सतह से नीचे की ओर यात्रा शुरू करते हैं, तो पहली परत यानी क्रस्ट (भूपर्पटी) को पार करते ही जो दूसरी परत आती है, उसे हम "मेंटल" (Mantle) कहते हैं। यह केवल एक बेजान चट्टानी परत नहीं है, बल्कि पृथ्वी के भीतर होने वाली हर हलचल, भूकंप और ज्वालामुखियों के पीछे की असली संचालक शक्ति है।
पृथ्वी के अंतर्तम का इतिहास और इस परत की खोज का सफर
इंसान हमेशा से आकाश के तारों को टटोलने में व्यस्त रहा, लेकिन खुद के पैरों के नीचे क्या है, इसकी खोज बहुत देर से शुरू हुई। बीसवीं सदी की शुरुआत तक हमारा मानना था कि धरती भीतर से एक सुलगती हुई गेंद है, जिसका कोई निश्चित ढांचा नहीं है। साल 1909 में क्रोएशिया के एक असाधारण मौसम वैज्ञानिक और भूकम्पविद् एंड्रीजा मोरोविक्सिक ने भूकंपीय तरंगों के व्यवहार में एक अजीब बदलाव दर्ज किया। उन्होंने पाया कि एक निश्चित गहराई पर जाकर ये तरंगें अचानक अपनी गति बदल लेती हैं।
इस सीमा को आज हम "मोहो असंबद्धता" (Moho Discontinuity) कहते हैं, जो पृथ्वी की ऊपरी परत क्रस्ट को उसकी दूसरी रहस्यमयी परत यानी मेंटल से अलग करती है। मेंटल का निर्माण लगभग 4.5 अरब साल पहले हुआ था, जब भारी तत्व जैसे लोहा और निकल पृथ्वी के केंद्र की ओर चले गए और हल्के सिलिकेट्स तैरकर ऊपर आ गए। इस विशाल रासायनिक विभाजन ने ही मेंटल को वह अनूठा घनत्व और स्वरूप दिया, जिसने हमारे ग्रह को एक गतिशील और रहने योग्य दुनिया में बदल दिया। आज हम जिसे टेक्टोनिक प्लेट्स की हलचल कहते हैं, उसका सीधा संबंध इसी परत की तापीय संरचना से है।
गर्मी का महासागर: कैसे काम करती है पृथ्वी की यह दूसरी परत?
मेंटल कोई स्थिर या जमी हुई चट्टान का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक बेहद धीमी गति से बहने वाले गाढ़े द्रव्य की तरह व्यवहार करती है। इसे समझने के लिए हमें इसके काम करने के विज्ञान को गहराई से देखना होगा।
सबसे पहले, इस परत की गहराई लगभग 2900 किलोमीटर तक फैली हुई है। इसे मुख्यतः दो भागों में बांटा जाता है: ऊपरी मेंटल और निचला मेंटल। ऊपरी मेंटल का एक हिस्सा जिसे "एस्थेनोस्फीयर" (Asthenosphere) कहा जाता है, अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण प्लास्टिक या अर्ध-पिघली हुई अवस्था में रहता है।
दूसरा चरण है संवहन धाराओं (Convection Currents) का निर्माण। पृथ्वी के कोर (कोर यानी सबसे आंतरिक भाग) से निकलने वाली भयानक गर्मी मेंटल के निचले हिस्से को गर्म करती है। गर्म होने पर यहाँ की चट्टानें हल्की होकर ऊपर की ओर उठती हैं। जैसे ही ये ऊपरी हिस्से में पहुँचती हैं, ठंडी होकर भारी हो जाती हैं और पुनः नीचे की ओर बैठ जाती हैं। यह लगातार चलने वाला चक्र एक विशाल हीटिंग सिस्टम की तरह काम करता है। इसी चक्र के कारण इसके ऊपर तैर रही क्रस्ट की प्लेटें आपस में टकराती हैं या एक-दूसरे से दूर जाती हैं, जिससे महाद्वीपों का खिसकना मुमकिन हो पाता है।
प्रकृति का उग्र प्रदर्शन: जब मेंटल ने बदली धरती की रूपरेखा
मेंटल के काम करने के तरीके को सीधे तौर पर समझने के लिए हमें प्रशांत महासागर के नीचे छिपे "हवाई द्वीपसमूह" के इतिहास को देखना होगा। हवाई के खूबसूरत द्वीप किसी पारंपरिक टेक्टोनिक प्लेट के टकराने से नहीं बने हैं। इसके पीछे मेंटल की एक बेहद खास प्रक्रिया है जिसे "मेंटल प्लम" (Mantle Plume) या हॉटस्पॉट कहा जाता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मेंटल की अगाध गहराइयों से गर्म पिघले हुए मैग्मा की एक संकीर्ण नली सीधे ऊपर की ओर उठी। इस प्रचंड गर्मी ने प्रशांत महासागरीय प्लेट को नीचे से पिघलाकर उसमें छेद कर दिया। जैसे ही यह मैग्मा समुद्र की सतह पर आया, ठंडी चट्टानों का निर्माण हुआ। समय के साथ प्लेट आगे खिसकती रही लेकिन मेंटल का वह हॉटस्पॉट अपनी जगह स्थिर रहा। नतीजा यह हुआ कि एक के बाद एक कई ज्वालामुखी द्वीप बनते चले गए, जिन्हें आज हम हवाई द्वीपसमूह के नाम से जानते हैं। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि पृथ्वी की यह दूसरी परत कितनी शक्तिशाली है और कैसे यह शांत दिखती धरती के भूगोल को रातों-रात बदलने की ताकत रखती है।
विशेषज्ञों का इस पर क्या कहना है
भू-वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के अनुसार, पृथ्वी की दूसरी परत यानी मेंटल (Mantle) हमारे ग्रह का सबसे रहस्यमयी और महत्वपूर्ण हिस्सा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मेंटल न केवल पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का एक बड़ा हिस्सा है, बल्कि यह पृथ्वी की सतह पर होने वाली हलचलों को भी नियंत्रित करता है। सीनियर सीस्मोलॉजिस्ट्स का कहना है कि इस परत में होने वाली थर्मल संवहन धाराएं (Thermal Convection Currents) ही टेक्टोनिक प्लेटों को गति देती हैं, जिससे महाद्वीपों का खिसकना और पर्वतों का निर्माण होता है। आधुनिक शोधकर्ताओं के मुताबिक, मेंटल के उच्च तापमान और दबाव वाली परिस्थितियों का अध्ययन करके हम न केवल भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोटों की सटीक भविष्यवाणी कर सकते हैं, बल्कि पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास और इसके चुंबकीय क्षेत्र के विकास को भी बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: पृथ्वी की दूसरी परत (मेंटल) किस चीज से बनी है और यह कितनी मोटी है?
पृथ्वी की दूसरी परत, जिसे मेंटल कहा जाता है, मुख्य रूप से सिलिकेट चट्टानों से बनी है जो लोहे और मैग्नीशियम से भरपूर होती हैं। यह परत क्रस्ट के ठीक नीचे से शुरू होकर लगभग 2,900 किलोमीटर की गहराई तक फैली हुई है। तापमान और दबाव के आधार पर इसे दो भागों में बांटा गया है - ऊपरी मेंटल और निचला मेंटल। ऊपरी मेंटल का एक हिस्सा (एस्थेनोस्फीयर) आंशिक रूप से पिघली हुई अवस्था में होता है, जो इसे प्लास्टिक की तरह लचीला बनाता है।
प्रश्न 2: क्या हम कभी पृथ्वी की इस दूसरी परत तक सीधे पहुंच सकते हैं?
वर्तमान तकनीक के साथ मेंटल तक सीधे पहुंचना या वहां तक खुदाई करना इंसानों के लिए लगभग असंभव है। वहां का अत्यधिक उच्च तापमान (जो 1000°C से 3700°C तक हो सकता है) और भीषण दबाव किसी भी मानव-निर्मित ड्रिलिंग मशीन को नष्ट कर सकता है। आज तक का सबसे गहरा इंसानी गड्ढा (कोला सुपरडीप बोरहोल) भी केवल 12.2 किलोमीटर गहरा था, जो क्रस्ट को भी पार नहीं कर सका। इसलिए, वैज्ञानिक इस परत का अध्ययन करने के लिए भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) और ज्वालामुखी से निकलने वाले मैग्मा पर निर्भर रहते हैं।
एक विचारणीय प्रश्न
यदि पृथ्वी की इस दूसरी परत में होने वाली हलचलें पूरी तरह से शांत हो जाएं, तो क्या हमारा यह गतिशील ग्रह जीवन के अनुकूल रह पाएगा, या हम भी मंगल ग्रह की तरह एक ठंडी और मृत दुनिया में बदल जाएंगे?
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