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भारत में परमाणु बम कहां रखे हैं? इसका सीधा और सच्चा जवाब यह है कि इनकी सटीक लोकेशन देश के सर्वोच्च सैन्य कमांडरों और प्रधानमंत्री के अलावा किसी को नहीं पता। यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे संवेदनशील राज है। हालांकि, रणनीतिक विशेषज्ञों और वैश्विक थिंक-टैंकों की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत अपने परमाणु हथियारों को किसी एक जगह पर रखने के बजाय देश के अलग-अलग हिस्सों में बेहद सुरक्षित और भूमिगत सैन्य ठिकानों में विभाजित करके रखता है। यह रणनीति किसी भी संभावित दुश्मन के अचानक होने वाले हमले से निपटने के लिए तैयार की गई है।
परमाणु क्षमता: आंकड़ों और रणनीतिक डेटा की ज़ुबानी
अगर हम वैश्विक परमाणु क्षमताओं पर नज़र रखने वाली संस्था 'सिपरी' (SIPRI) के हालिया आंकड़ों को देखें, तो भारत के पास वर्तमान में लगभग 160 से 172 चालू परमाणु हथियार (Nuclear Warheads) मौजूद हैं। भारत की परमाणु नीति पूरी तरह से "नो फर्स्ट यूज़" (No First Use) यानी पहले हमला न करने के सिद्धांत पर टिकी है। इसका मतलब यह है कि भारत इन हथियारों को हमेशा 'डिअसेम्बल्ड' (Disassembled) अवस्था में रखता है। यानी परमाणु कोर (Fissile Core) और उन्हें ले जाने वाली मिसाइलें या बम अलग-अलग जगहों पर संग्रहित होते हैं। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) और इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) जैसे संस्थान इन हथियारों के लिए जरूरी प्लूटोनियम का उत्पादन और प्रबंधन करते हैं, जबकि इनका नियंत्रण सीधे तौर पर भारत की स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) के हाथों में होता है, जो सीधे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट करती है।
भंडारण और तैनाती: मुख्य रणनीतिक विकल्पों का विश्लेषण
भारत अपने परमाणु बमों को सुरक्षित रखने के लिए तीन मुख्य विकल्पों यानी 'न्यूक्लियर ट्रायड' (Nuclear Triad) का इस्तेमाल करता है। पहला विकल्प है वायु सेना के विशेष ठिकाने। ग्वालियर, अंबाला और महाराजपुर जैसे एयरबेस पर तैनात मिराज-2000 और राफेल लड़ाकू विमान इन बमों को गिराने में सक्षम हैं, इसलिए इनके नजदीकी डिपो में कड़ी सुरक्षा के बीच हथियारों के कलपुर्जे रखे जाते हैं। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण विकल्प है थल सेना की मिसाइल साइलो (Silos)। राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों या मध्य भारत के घने जंगलों के भीतर गहरे अंडरग्राउंड बंकर बनाए गए हैं, जहां अग्नि और पृथ्वी जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों को तैनात रखा जाता है। तीसरा और सबसे सुरक्षित विकल्प नौसेना की परमाणु पनडुब्बियां हैं। आईएनएस अरिहंत (INS Arihant) जैसी पनडुब्बियां समंदर की गहराइयों में परमाणु मिसाइलों से लैस होकर गश्त करती हैं। समंदर के नीचे छिपे होने के कारण दुश्मन के लिए इनकी सही लोकेशन का पता लगाना पूरी तरह असंभव हो जाता है।
अति-गोपनीयता के जोखिम: एक ज़रूरी और सतर्क पहलू
परमाणु हथियारों को इतनी भारी गोपनीयता और अलग-अलग हिस्सों में रखने के अपने कुछ गंभीर जोखिम भी होते हैं। सबसे बड़ा ख़तरा 'कमांड और कंट्रोल' की जटिलता का है। युद्ध जैसी आपातकालीन स्थिति में जब संचार व्यवस्था (Communication Channels) बाधित हो जाएं, तो अलग-अलग ठिकानों से परमाणु कोर और मिसाइल को एक साथ लाकर तुरंत असेंबल करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके अलावा, खुफिया ठिकानों के आस-पास अनजाने में होने वाली किसी भी तरह की लीकेज या तकनीकी ख़राबी एक बड़ी तबाही का कारण बन सकती है। यद्यपि भारत का सुरक्षा तंत्र अभेद्य है, लेकिन आधुनिक दौर में साइबर हमलों (Cyber Warfare) और उपग्रहीय निगरानी (Satellite Surveillance) के बढ़ते दायरे ने इन गुप्त ठिकानों की सुरक्षा के सामने एक निरंतर बनी रहने वाली नई चुनौती खड़ी कर दी है।
एक अल्पज्ञात तथ्य जो अक्सर छूट जाता है
भारत की परमाणु रणनीति से जुड़ा एक ऐसा सच है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, और वह है भारत की 'डी-मेटेड' (De-mated) स्थिति। इसका मतलब है कि शांति काल में भारत अपने परमाणु हथियारों को पूरी तरह तैयार यानी असेंबल करके नहीं रखता है। भारत के परमाणु वॉरहेड (worseads) और उन्हें ले जाने वाली मिसाइलें या डिलीवरी सिस्टम अलग-अलग जगहों पर पूरी तरह सुरक्षित रखे जाते हैं। परमाणु बम का कोर हिस्सा वैज्ञानिकों की निगरानी में होता है, जबकि डिलीवरी सिस्टम सेना के पास होता है। यह रणनीति किसी भी तरह के
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