विषय-सूची
- 1. इस महाप्रोजेक्ट के कुछ ऐसे आंकड़े जो आपके होश उड़ा देंगे
- 2. कुदरती सूरज बनाम इंसानी मशीन: काम करने के तौर-तरीकों का अंतर
- 3. असीमित ऊर्जा की इस अंधी दौड़ में छिपे हुए भयानक खतरे
- 4. एक अनसुना सच जिसे अधिकांश लोग नजरअंदाज करते हैं
- 5. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- 6. हमारा नजरिया और आपकी जिम्मेदारी
इस सवाल का सीधा और सपाट जवाब तो यही है कि ब्रह्मांड में चमकने वाले असली कुदरती सूरज को किसी भी देश ने नहीं बनाया है। वह सौरमंडल के केंद्र में अरबों सालों से धधक रहा एक विशाल प्राकृतिक तारा है। लेकिन अगर हम इंसानी जिद, आधुनिक विज्ञान और नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की बात करें, तो चीन ने इस दिशा में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है। चीनी वैज्ञानिकों ने एक ऐसी मशीन तैयार की है जो हूबहू असली सूरज की तरह ऊर्जा पैदा करती है। इसीलिए दुनिया भर में इसे चीन का कृत्रिम सूरज या 'आर्टिफिशियल सन' कहा जा रहा है।
इस महाप्रोजेक्ट के कुछ ऐसे आंकड़े जो आपके होश उड़ा देंगे
इस अद्भुत वैज्ञानिक प्रयोग को तकनीकी भाषा में EAST (Experimental Advanced Superconducting Tokamak) नाम दिया गया है। आंकड़े गवाह हैं कि यह इंसानी इतिहास की सबसे पेचीदा मशीनों में से एक है। साल 2021 के एक परीक्षण के दौरान इस रिएक्टर ने 120 मिलियन (12 करोड़) डिग्री सेल्सियस का तापमान हासिल किया था, और वो भी पूरे 101 सेकंड के लिए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हमारे असली सूरज का मुख्य केंद्र (Core) लगभग 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस गर्म है। यानी इस मशीन ने असली सूरज से भी करीब आठ गुना ज्यादा गर्मी पैदा कर दी। इसके बाद एक और रिकॉर्ड बनाते हुए इसने 160 मिलियन डिग्री सेल्सियस के तापमान को 20 सेकंड तक रोक कर रखा। इस पूरे ढांचे को बनाने में चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है और इसकी चुंबकीय शक्ति को संभालने के लिए सुपरकंडक्टिंग तकनीक का सहारा लिया जाता है।
कुदरती सूरज बनाम इंसानी मशीन: काम करने के तौर-तरीकों का अंतर
असली सूरज और चीन के इस कृत्रिम सूरज के बीच का मुकाबला बेहद दिलचस्प है। कुदरती सूरज अपने विशालकाय द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण बल के कारण हाइड्रोजन के परमाणुओं को आपस में दबाता है, जिससे हीलियम बनती है और अपार ऊर्जा निकलती है। इसके विपरीत, धरती पर इतना गुरुत्वाकर्षण पैदा करना नामुमकिन है। इसलिए चीनी वैज्ञानिकों ने मैग्नेटिक कन्फाइनमेंट (चुंबकीय अवरोध) का रास्ता चुना। एक डोनट के आकार वाले विशाल वैक्यूम चैंबर के भीतर हाइड्रोजन के आइसोटोप्स (ड्यूटेरियम और ट्रिटियम) को बेहद उच्च तापमान पर प्लाज्मा में बदला जाता है। जहाँ असली सूरज अपने विशालकाय आकार के दम पर चलता है, वहीं यह कृत्रिम सूरज बेहद ताकतवर चुंबकीय क्षेत्रों की मदद से उस खौलते हुए प्लाज्मा को एक निश्चित दायरे में नियंत्रित रखता है ताकि वह मशीन की दीवारों को पिघला न दे।
असीमित ऊर्जा की इस अंधी दौड़ में छिपे हुए भयानक खतरे
यह तकनीक जितनी लुभावनी दिखती है, इसके खतरे उतने ही दिल दहला देने वाले हैं। सबसे बड़ी चुनौती इस भयंकर तापमान को संभालना है। अगर प्लाज्मा को नियंत्रित करने वाला चुंबकीय क्षेत्र एक मिलीसेकंड के लिए भी लड़खड़ाया, तो करोड़ों डिग्री गर्म वह प्लाज्मा रिएक्टर की दीवारों को पल भर में राख कर देगा। इसे वैज्ञानिक भाषा में 'प्लाज्मा व्यवधान' कहते हैं। इसके अलावा, इस संलयन प्रक्रिया के दौरान अत्यधिक ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन निकलते हैं, जो धीरे-धीरे रिएक्टर के मटीरियल को ही रेडियोधर्मी (रेडियोएक्टिव) बना देते हैं। यदि कोई बड़ी तकनीकी खराबी आई, तो यह थर्मल रनअवे का रूप ले सकता है, जिससे अरबों रुपये की यह प्रयोगशाला एक झटके में तबाह हो जाएगी।
एक अनसुना सच जिसे अधिकांश लोग नजरअंदाज करते हैं
जब हम "कृत्रिम सूरज" या न्यूक्लियर फ्यूजन की बात करते हैं, तो अक्सर लोगों का ध्यान केवल चीन या अमेरिका जैसे बड़े देशों पर जाता है। लेकिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनसुना सच यह है कि यह किसी एक अकेले देश का चमत्कार नहीं है। दुनिया का सबसे बड़ा न्यूक्लियर फ्यूजन प्रोजेक्ट, जिसे ITER (इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर) कहा जाता है, फ्रांस में स्थित है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसमें भारत सहित दुनिया के 35 देश एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। भारत इस महा-परियोजना में एक बेहद अहम हिस्सेदार है और रिएक्टर के लिए जरूरी कई जटिल उपकरण (जैसे क्रायोस्टेट) भारतीय वैज्ञानिकों ने ही तैयार किए हैं। लोग अक्सर सोचते हैं कि किसी एक देश ने सूरज बना लिया, जबकि सच्चाई यह है कि यह पूरी मानवता को असीमित और स्वच्छ ऊर्जा देने का एक सामूहिक वैश्विक प्रयास है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: क्या चीन ने सच में एक नया सूरज आसमान में स्थापित कर दिया है?
उत्तर: नहीं, चीन ने आसमान में कोई नया सूरज नहीं भेजा है। उन्होंने धरती पर एक प्रयोगशाला के अंदर एक मशीन बनाई है, जिसे EAST कहा जाता है। यह मशीन असली सूरज की तरह ऊर्जा पैदा करने की कोशिश करती है।
प्रश्न 2: इस कृत्रिम सूरज का तापमान असली सूरज से कितना ज्यादा है?
उत्तर: चीन के कृत्रिम सूरज ने करीब 12 करोड़ डिग्री सेल्सियस का तापमान हासिल किया है, जो असली सूरज के केंद्र के तापमान (लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस) से कई गुना अधिक है।
प्रश्न 3: क्या भारत भी अपना खुद का कृत्रिम सूरज बना रहा है?
उत्तर: भारत वैश्विक परियोजना ITER का एक मुख्य सदस्य है। इसके अलावा, भारत के पास गांधीनगर में अपना खुद का 'आदित्य' और 'एसएसटी-1' नामक टोकामक रिएक्टर है, जिस पर हमारे वैज्ञानिक लगातार रिसर्च कर रहे हैं।
प्रश्न 4: इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा क्या होगा?
उत्तर: जब यह तकनीक पूरी तरह सफल हो जाएगी, तो हमें बिना किसी प्रदूषण या खतरनाक परमाणु कचरे के, हमेशा खत्म न होने वाली स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) मिल सकेगी।
हमारा नजरिया और आपकी जिम्मेदारी
कृत्रिम सूरज का निर्माण यह साबित करता है कि इंसानी दिमाग विज्ञान के दम पर कुछ भी हासिल कर सकता है। हमारा यह स्पष्ट मानना है कि इस तकनीक को किसी एक देश की जीत के रूप में देखने के बजाय, पूरी पृथ्वी के भविष्य को सुधारने वाले एक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। अब समय आ गया है कि हम सभी विज्ञान और अनुसंधान (Research) के महत्व को समझें। आज ही से वैज्ञानिक खबरों के प्रति जागरूक बनें, अफवाहों पर विश्वास न करें और आने वाली पीढ़ी को विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित करें। जागरूक नागरिक बनकर ही हम इस तकनीकी क्रांति का सही लाभ उठा सकते हैं।
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