दुनिया में लगभग 1.8 अरब मुसलमान हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस्लामी शरीयत में मां का हक बाप के मुकाबले तीन गुना ज्यादा माना गया है? कुरान का साफ और सीधा पैगाम है कि वालिदैन, खासकर मां की खिदमत ही जन्नत का रास्ता खोलती है। पैगंबर हजरत मोहम्मद (स.) ने तो साफ लफ्जों में फरमाया कि जन्नत मां के कदमों तले है। यह सिर्फ एक जज्बाती जुमला नहीं, बल्कि एक अटल रूहानी सच्चाई है।

कुरानी पैगाम की गहराई और इसका ऐतिहासिक background

अरब के उस दौर की कल्पना कीजिए जब बेटियों को ज़िंदा दफना दिया जाता था और औरतों को सिर्फ एक चीज़ समझा जाता था। उस काले दौर में कुरान ने नाज़िल होकर औरतों और खास तौर पर मां को वो मकाम दिया जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी। सूरह अल-अहकाफ और सूरह लुकमान जैसी सूरतों में अल्लाह ने इंसान को अपनी मां का एहसान मानने की सख्त हिदायत दी है।

कुरान में बार-बार इस बात का ज़िक्र आता है कि मां ने तुम्हें तकलीफ पर तकलीफ सहकर अपने पेट में रखा। फिर दो साल तक अपना दूध पिलाया। यह ज़िक्र कोई मामूली बात नहीं है। अल्लाह ताला खुद मां की उस बेमिसाल कुर्बानी, दर्द और सहनशक्ति को याद दिलाता है ताकि इंसान का तकब्बुर टूट सके। अरबी ज़बान का लासानी लफ्ज़ 'रहम' (यानी कोख) सीधे अल्लाह की सिफत 'रहमान' (यानी बेइंतहा रहम करने वाला) से जुड़ा है। इसका मतलब यह है कि मां की ममता में ईश्वर की रहमत का एक अक्स मौजूद होता है।

मां के हक को अदा करने का कुरानी तरीका: Step by Step समझें

कुरान सिर्फ जज्बाती बातें नहीं करता, बल्कि इंसान को अपनी मां के साथ बर्ताव करने की एक प्रैक्टिकल और सख्त गाइडलाइन भी देता है। आइए इस सिलसिले को परत-दर-परत समझते हैं:

पहला कदम: 'उफ़' तक न कहना। सूरह अल-इसरा (17:23) में हुक्म है कि जब तुम्हारे मां-बाप बुढ़ापे को पहुंच जाएं, तो उनके सामने उफ तक मत कहो। यानी नराजगी या झुंझलाहट का छोटा सा इशारा भी सख्त गुनाह है।

दूसरा कदम: आजिज़ और नरम लहजा। बातचीत में अपनी आवाज को हमेशा नीचा रखो। भले ही आप दुनिया के सबसे कामयाब इंसान बन जाएं, मां के सामने आपकी हैसियत सिर्फ एक निहत्थे बच्चे की तरह होनी चाहिए।

तीसरा कदम: दुआ का दायरा। कुरान हमें सिखाता है कि हमेशा मां-बाप के लिए दुआ करो: "ऐ मेरे रब! इन दोनों पर रहम फरमा, जैसे इन्होंने मुझे बचपन में पाला।" यह दुआ इंसान के दिल से गुरूर को मिटा देती है।

चौथा कदम: मादियत और खिदमत। मां की हर जरूरत को पूरा करना, उनके आराम का ख्याल रखना और अपनी कमाई में से सबसे बेहतरीन हिस्सा उन पर खर्च करना फर्ज है।

एक रूहानी मिसाल: हज़रत उवैस करनी का ऐतिहासिक किस्सा

मां की खिदमत और कुरानी हुक्म की तालीम को समझने के लिए यमन के रहने वाले हज़रत उवैस करनी की मिसाल से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। वह पैगंबर हजरत मोहम्मद (स.) के दौर में मौजूद थे, लेकिन अपनी शदीद बीमार और बूढ़ी मां की देखभाल के कारण कभी नबी से मिलने मदीना नहीं जा सके। ज़ाहिरी तौर पर वह एक आम और गरीब चरवाहे थे।

लेकिन मां की खिदमत के इस जज़्बे ने उन्हें अल्लाह की नजर में इतना बुलंद कर दिया कि आका (स.) ने अपने सहाबा से फरमाया था कि जब उवैस आए, तो उससे अपने गुनाहों की मगफिरत की दुआ करवाना। एक इंसान जो कभी नबी से नहीं मिला, सिर्फ अपनी मां की निस्वार्थ खिदमत के दम पर इस्लाम के सबसे महान औलिया में शुमार हो गया। यह वाकया साबित करता है कि कुरान का मां के बारे में क्या नज़रिया है।