भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसके बावजूद इसे अभी तक 'विकसित देश' की श्रेणी में नहीं रखा गया है। इसका सीधा कारण हमारी प्रति व्यक्ति आय का निम्न स्तर, व्यापक गरीबी और संस्थागत कमजोरियां हैं जो तीव्र आर्थिक वृद्धि के लाभों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से पहुंचने से रोकती हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और औपनिवेशिक विरासत का दीर्घकालिक प्रभाव

किसी भी राष्ट्र की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसके अतीत के पन्नों को पलटना अनिवार्य हो जाता है। जब भारत ने औपनिवेशिक शासन की बेड़ियों को तोड़ा, तो वह केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुआ था, बल्कि उसकी आर्थिक रीढ़ पूरी तरह चरमरा चुकी थी। सदियों के शोषण ने पारंपरिक शिल्प उद्योगों को नेस्तनाबूद कर दिया था और कृषि को मानसून के जुए पर निर्भर छोड़ दिया था। स्वाधीनता के बाद की शुरुआती दशकों की नीतियां समाजवादी ढांचे से प्रभावित थीं, जहां तीव्र औद्योगिकीकरण की बजाय आयात प्रतिस्थापन पर अत्यधिक जोर दिया गया। इस 'लांच राज' और लाल फीताशाही ने निजी उद्यमशीलता की ऊर्जा को कुंद कर दिया। यद्यपि 1991 के आर्थिक सुधारों (LPG Reforms) ने इस दिशा को बदला और वैश्वीकरण के द्वार खोले, फिर भी औपनिवेशिक काल से चली आ रही संस्थागत जड़ता पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। बुनियादी ढांचे की कमी और नीतिगत पंगुता ने विकास की उस रफ्तार को थामे रखा जिसकी परिकल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी। यह केवल पूंजी की कमी का मामला नहीं था, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र का भी संकट था जो पुरानी कार्यसंस्कृति से बाहर नहीं निकल पा रहा था। परिणाम यह हुआ कि भारत ने कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मामले में बड़ी छलांगें लगाईं, लेकिन संचयी विकास का लाभांश असमानता की गहरी खाई में खो गया।

जनसांख्यिकीय लाभांश, शिक्षा और कौशल विकास का विसंगतिपूर्ण परिदृश्य

आज भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शुमार है, जिसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' यानी जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जा रहा है। सैद्धांतिक रूप से यह स्थिति किसी भी देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए स्वर्ण अवसर होती है, बशर्ते कार्यबल पर्याप्त रूप से कुशल और शिक्षित हो। यहीं पर हमारी सबसे बड़ी विसंगति उजागर होती है। पारंपरिक शिक्षा प्रणाली आज भी रटन विद्या और क्लर्क तैयार करने की मानसिकता पर टिकी हुई है। आधुनिक तकनीक, अनुसंधान (Research and Development) और बाजार की बदलती जरूरतों के अनुकूल कौशल प्रशिक्षण का अभाव हमारे युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेल देता है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता के आंकड़े अक्सर निराशाजनक होते हैं, जहां सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। जब देश का एक बड़ा हिस्सा केवल औपचारिक साक्षरता तक सीमित रहता है और उच्च तकनीक आधारित उद्योगों में योगदान देने में असमर्थ होता है, तब वह जनसांख्यिकीय लाभांश वरदान की बजाय अभिशाप या बेरोजगारी के दबाव में बदल जाता है। चीन या दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी आबादी को कौशल संपन्न बनाकर ही विकसित अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में प्रवेश किया था, जबकि भारत इस मोर्चे पर अभी भी नियोजन और क्रियान्वयन के भारी अंतर से जूझ रहा है।

आर्थिक असमानता, कृषि पर निर्भरता और सामाजिक-संरचनात्मक चुनौतियां

विकास के सूचकांक केवल बड़ी कंपनियों के मुनाफे या शेयर बाजार की उछाल से तय नहीं होते, बल्कि यह देखते हैं कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का जीवन स्तर कैसा है। आज भारत में धन का संकेन्द्रण इस हद तक बढ़ चुका है कि एक बहुत छोटा तबका कुल संपत्ति के बड़े हिस्से पर काबिज है, जबकि बहुसंख्यक आबादी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है। दूसरी ओर, हमारी लगभग आधी आबादी आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि क्षेत्र पर निर्भर है, जो कुल जीडीपी में बहुत कम योगदान देता है। छोटे और सीमांत किसानों की बहुलता, भूमि के छोटे टुकड़े, आधुनिक तकनीकों की अनुपलब्धता और जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि संकट गहराता जा रहा है। जब तक कृषि क्षेत्र को लाभकारी और औद्योगिक क्षेत्र को रोजगारोमुख नहीं बनाया जाता, तब तक समावेशी विकास का सपना अधूरा ही रहेगा। इसके साथ ही, सामाजिक कुरीतियां, लैंगिक असमानता और श्रम बाजार में महिलाओं की न्यूनतम भागीदारी भी हमारी प्रगति के मार्ग में बड़े अवरोधक हैं। जब तक आधी आबादी आर्थिक गतिविधियों से बाहर रहेगी, तब तक राष्ट्र अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग करने में असमर्थ रहेगा।