एक ऐसा देश जिसे दशकों तक विदेशी ऊर्जा स्रोतों पर अपनी निर्भरता के लिए जाना जाता था, आज दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक बन बैठा है। जी हाँ, यह कोई कल्पना नहीं बल्कि आज की कड़वी-मीठी भू-राजनीतिक सच्चाई है। अगर सीधे शब्दों में कहें, तो अमेरिका अपनी कुल खपत का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब खुद ही निकालता है, लेकिन ऊर्जा बाजार की पेचीदगियों के कारण यह कहानी इतनी सीधी भी नहीं है जितनी दिखाई देती है।

इस ऊर्जा क्रांति की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक सफर

दशकों पहले की बात करें तो अमेरिका अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से खाड़ी देशों और अन्य विदेशी ताकतों की रहमो-करम पर निर्भर था। सन् 1970 के दशक के ऊर्जा संकट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। तब यह साफ हो गया था कि यदि देश को महाशक्ति बने रहना है, तो ऊर्जा के मोर्चे पर आत्मनिर्भर होना अनिवार्य है। लंबे समय तक अमेरिकी तेल का उत्पादन घट रहा था और आयात लगातार बढ़ रहा था। लेकिन फिर एक तकनीकी चमत्कार हुआ जिसने खेल का पासा पलट कर रख दिया।

यह पूरी प्रक्रिया तकनीकी रूप से कैसे काम करती है

इस अभूतपूर्व बदलाव के पीछे मुख्य रूप से दो तकनीकों का हाथ है: हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग यानी 'फ्रacking' और क्षैतिज ड्रिलिंग (Horizontal Drilling)। पारंपरिक तरीकों से जमीन के बहुत नीचे फंसा हुआ तेल निकालना नामुमकिन सा लगता था। इस नई तकनीक में पानी, रेत और विशेष रासायनिक मिश्रण को अत्यधिक उच्च दबाव के साथ चट्टानों के भीतर भेजा जाता है। इससे चट्टानें चटक जाती हैं और उनके भीतर कैद कच्चा तेल तथा प्राकृतिक गैस बाहर निकलने लगते हैं। इस तरह शेल ऑयल के अपार भंडार अचानक से पहुंच के दायरे में आ गए।

टेक्सास के परमिया बेसिन का एक वास्तविक उदाहरण

इस पूरी क्रांति को जमीन पर उतरते देखना हो तो अमेरिका के टेक्सास राज्य स्थित 'परमिया बेसिन' (Permian Basin) की ओर देखना होगा। कभी बंजर और वीरान समझी जाने वाली इस जमीन ने रातों-रात अमेरिकी अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी। यहाँ छोटी-बड़ी सैकड़ों कंपनियाँ रोजाना लाखों बैरल तेल निकाल रही हैं। यहाँ तक कि इस क्षेत्र के छोटे शहरों में नौकरियों का सैलाब आ गया और अमेरिकी जीडीपी को एक नया संबल मिला। आज यह अकेला क्षेत्र दुनिया के कई बड़े तेल उत्पादक देशों को अकेले टक्कर देता नजर आता है।

What experts say about it

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश बन चुका है, लेकिन 'ऊर्जा स्वतंत्रता' (Energy Independence) का यह दावा पूरी तरह सही नहीं है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, तेल एक वैश्विक कमोडिटी है जिसकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में तय होती हैं। अमेरिकी रिफाइनरियों की तकनीकी बनावट ऐसी है कि उन्हें भारी और कच्चे तेल के आयात की जरूरत पड़ती है, जबकि घरेलू स्तर पर निकलने वाला शेल ऑयल हल्का होता है। यही कारण है कि अमेरिका भारी मात्रा में तेल का निर्यात करने के बावजूद विदेशों से तेल आयात करना जारी रखता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल या सप्लाई चेन में रुकावट सीधे तौर पर अमेरिकी पेट्रोल पंपों की कीमतों को प्रभावित करती है, जिससे पूरी तरह से अलग-थलग रहना असंभव हो जाता है।

Frequently Asked Questions

क्या अमेरिका अपनी जरूरत का सारा तेल खुद निकालता है?

हाँ, मात्रा के लिहाज से अमेरिका इतना तेल उत्पादित करता है कि वह अपनी कुल घरेलू खपत के आंकड़े को छू सकता है या पार कर सकता है, लेकिन गुणवत्ता और रिफाइनिंग की तकनीकी सीमाओं के कारण वह अपनी जरूरत का सारा तेल अकेले इस्तेमाल नहीं कर पाता। अमेरिका कुछ खास प्रकार के क्रूड ऑयल का निर्यात करता है और अपनी रिफाइनरियों की मांग पूरी करने के लिए अन्य देशों से अलग ग्रेड का तेल आयात करता है।

क्या घरेलू उत्पादन बढ़ने से अमेरिकी नागरिकों को सस्ता पेट्रोल मिलता है?

हमेशा ऐसा नहीं होता। चूंकि अमेरिकी तेल कंपनियाँ वैश्विक बाजार में ऊँची कीमतों पर अपना तेल बेचना ज्यादा फायदेमंद मानती हैं, इसलिए घरेलू उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि होने के बावजूद स्थानीय उपभोक्ताओं को वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव और महँगाई का सामना करना पड़ता है।

क्या भविष्य में कोई भी देश वैश्विक ऊर्जा बाजार से पूरी तरह कटकर सिर्फ अपने दम पर जीवित रह सकता है?