क्या आपने कभी सोचा है कि जिस मूंगफली को आप चाव से खाते हैं, उससे असल में कितना तेल निकलता है? चौंकिए मत, गणित थोड़ा पेचीदा है। आम तौर पर, एक क्विंटल यानी 100 किलोग्राम अच्छी गुणवत्ता वाली मूंगफली से लगभग 38 से 45 किलोग्राम तक तेल प्राप्त किया जा सकता है। यह मात्रा मूंगफली की किस्म, उसमें मौजूद नमी और पेराई की तकनीक पर पूरी तरह निर्भर करती है। आइए, इस लेख में इस दिलचस्प विषय की तह तक उतरते हैं और इसके हर पहलू को बारीकी से समझते हैं।

मूंगफली की पृष्ठभूमि और इसका कृषि इतिहास

मूंगफली जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'अराकिस हाइपोजिया' कहा जाता है, मूल रूप से दक्षिण अमेरिका की देन है। प्राचीन काल में पेरू और ब्राजील के आदिवासी किसानों ने सबसे पहले इसकी खेती शुरू की थी। पुर्तगाली और स्पेनिश व्यापारियों के जरिए यह फसल भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुँची। भारत में आज यह तिलहन फसलों का एक बेहद महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है। गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और राजस्थान इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।

ऐतिहासिक रूप से, मूंगफली को केवल खाने की वस्तु नहीं बल्कि ऊर्जा और वसा का एक बड़ा स्रोत माना गया है। इसकी खेती के लिए हल्की दोमट मिट्टी और गर्म जलवायु सबसे मुफीद होती है। इसके पौधे की एक अनोखी विशेषता यह होती है कि इसके फूल जमीन के ऊपर खिलते हैं, लेकिन परागण के बाद इसकी सुइयां जमीन के भीतर चली जाती हैं और वहीं फल यानी मूंगफली का विकास होता है। यही वजह है कि इसे जमीन के भीतर का खजाना कहा जाता है। समय के साथ, किसानों ने ऐसी उन्नत किस्में विकसित की हैं जिनमें तेल की मात्रा पारंपरिक किस्मों की तुलना में काफी अधिक होती है।

तेल निकालने की प्रक्रिया: खेत से मिल तक का सफर

मूंगफली से शुद्ध तेल प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है। सबसे पहले खेतों से कटी हुई मूंगफली को अच्छी तरह धूप में सुखाया जाता है ताकि उसमें मौजूद नमी की मात्रा कम से कम हो सके। अगर दानों में नमी अधिक रह जाए, तो तेल की रिकवरी घट जाती है और फफूंद लगने का खतरा भी बढ़ जाता है।

सुखाने के बाद, थ्रेशर या हाथों की मदद से छिलके (फली) को अलग किया जाता है और केवल बीजों (गिरियों) को सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद इन बीजों की सफाई की जाती है ताकि धूल, कंकड़ और खराब दाने बाहर हो जाएं। साफ किए गए दानों को मिल में भेजकर कोल्हू, एक्सपेलर या आधुनिक हाइड्रोलिक प्रेस मशीनों के जरिए पेराई की जाती है।

पारंपरिक घाणी या कोल्हू में धीमी गति से पेराई होती है, जिससे तेल अपने प्राकृतिक गुणों और खुशबू को बनाए रखता है। वहीं, आधुनिक एक्सपेलर मशीनों में तीव्र गति और घर्षण के कारण दाने गर्म हो जाते हैं, जिससे तेल की निकासी अधिक मात्रा में होती है। पेराई के बाद जो शुद्ध तरल निकलता है, उसे कच्चा तेल कहते हैं। इस कच्चे तेल को बाद में फ़िल्टर करके और उसकी अशुद्धियों को दूर करके बाजार में बेचने के लिए पैक किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के अंत में जो सूखा अवशेष बचता है, उसे खल (Oil Cake) कहते हैं, जो पशुओं के चारे के रूप में बहुत पौष्टिक माना जाता है।

एक वास्तविक उदाहरण: रामू किसान की कहानी

इस पूरी गणित को और अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए आइए मध्य प्रदेश के एक प्रगतिशील किसान रामू का उदाहरण लेते हैं। पिछले सीजन में रामू ने अपने खेतों में उन्नत किस्म की मूंगफली की फसल उगाई थी। कटाई के बाद उसने अपनी उपज से ठीक 1 क्विंटल यानी 100 किलोग्राम साफ़ और सूखी मूंगफली की गिरियाँ चुनीं।

रामू ने इन गिरियों को स्थानीय आधुनिक तेल मिल में पेराई के लिए दिया। चूँकि इस बार गर्मी अच्छी थी और दाने पूरी तरह सूखे हुए थे, इसलिए मिल वाले ने बेहतर परिणाम का अनुमान लगाया। पेराई पूरी होने के बाद, जब हिसाब हुआ तो उस एक क्विंटल मूंगफली से कुल 42 किलोग्राम शुद्ध मूंगफली का तेल प्राप्त हुआ।

इसके अलावा, लगभग 55 किलोग्राम उच्च गुणवत्ता वाली खल भी बची, जिसे रामू ने अपने डेयरी फार्म के मवेशियों के लिए रख लिया और बाकी बाजार में बेच दी। इस छोटे से मामले से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि यदि दाने बेहतरीन किस्म के हों और नमी की मात्रा न्यूनतम हो, तो एक क्विंटल से लगभग 40 से 45 किलोग्राम तेल निकालना पूरी तरह संभव है।

विशेषज्ञों की राय और निष्कर्ष

कृषि और खाद्य प्रसंस्करण विशेषज्ञों का मानना है कि 1 क्विंटल (100 किलोग्राम) मूंगफली से निकलने वाले तेल की मात्रा पूरी तरह से उसके प्रकार, गुणवत्ता और उसमें मौजूद नमी की मात्रा पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर, बाजार में मिलने वाली अच्छी गुणवत्ता की मूंगफली से 35 से 45 लीटर तक शुद्ध तेल प्राप्त किया जा सकता है। आधुनिक तकनीक और उन्नत कोल्हू या एक्सपेलर मशीनों का उपयोग करने से तेल की रिकवरी दर में काफी सुधार होता है, जिससे किसानों और छोटे व्यवसायियों को अधिक लाभ मिलता है।

विशेषज्ञों का यह भी सुझाव है कि मूंगफली से तेल निकालते समय तापमान और दबाव का सही संतुलन रखना बेहद जरूरी है। यदि मूंगफली में नमी की मात्रा अधिक है, तो तेल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और मात्रा भी कम हो सकती है। इसलिए, पिराई से पहले मूंगफली को अच्छी तरह से धूप में सुखाना और उसकी ग्रेडिंग करना आवश्यक माना जाता है। व्यावसायिक स्तर पर काम करने वाले उद्यमियों के लिए यह प्रक्रिया अत्यधिक लाभदायक साबित हो सकती है, बशर्ते वे सही मशीनरी और वैज्ञानिक तरीकों का पालन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या घर पर सामान्य विधि से मूंगफली का तेल निकाला जा सकता है?

हाँ, घर पर पारंपरिक तरीकों जैसे छोटे घरेलू तेल प्रेस या ओखली-मूसली और पारंपरिक बर्तनों का उपयोग करके मूंगफली का तेल निकाला जा सकता है। हालांकि, पारंपरिक घरेलू विधियों से तेल की मात्रा व्यावसायिक मशीनों की तुलना में काफी कम निकलती है और इसमें मेहनत भी अधिक लगती है। व्यावसायिक लाभ के लिए स्वचालित एक्सपेलर मशीनों का उपयोग ही सबसे उत्तम विकल्प माना जाता है।

प्रश्न 2: मूंगफली की खली (ऑयल केक) का उपयोग कहाँ किया जाता है?

तेल निकालने के बाद जो ठोस अपशिष्ट बचता है, उसे मूंगफली की खली कहा जाता है। यह प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर होती है, जिसका मुख्य उपयोग पशुओं के उच्च गुणवत्ता वाले चारे के रूप में किया जाता है। इसके अलावा, इसकी पौष्टिक प्रकृति के कारण इसका उपयोग कृषि में एक बेहतरीन जैविक खाद (ऑर्गेनिक फर्टिलाइज़र) के रूप में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।

क्या पारंपरिक कोल्हू से निकाला गया मूंगफली का तेल आधुनिक मशीनों के तेल से स्वास्थ्य के लिए अधिक फायदेमंद होता है?