विषय-सूची
- 1. बीजिंग के महात्वाकांक्षी जाल का ऐतिहासिक और वैचारिक खाका
- 2. किस तरह बुना जाता है यह आर्थिक मकड़जाल: चरण-दर-चरण प्रक्रिया
- 3. श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह: एक जीवंत और चेतावनी भरा उदाहरण
- 4. What experts say about it
- 5. Frequently Asked Questions
- 6. What if the entire global economy eventually becomes dependent on a single creditor nation's terms?
दुनियाभर के देशों को अपनी आर्थिक गिरफ्त में लेने की चीन की यह खामोश चाल अब किसी से छिपी नहीं है। एक ऐसा चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आता है कि ग्लोबल साउथ के दर्जनों देश आज बीजिंग के अरबों डॉलर के तले दबे हुए हैं, जो उनकी कुल जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा है। असल में, यह कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीतिक बिसात है, जिसके जरिए चीन बिना एक भी गोली चलाए दुनिया भर के सामरिक और आर्थिक अड्डों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर रहा है।
बीजिंग के महात्वाकांक्षी जाल का ऐतिहासिक और वैचारिक खाका
इस पूरी रणनीति की जड़ें चीन की उस पुरानी साम्राज्यवादी सोच में धँसी हैं, जिसे आधुनिक संदर्भ में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई का नाम दिया गया है। साल 2013 के आसपास जब इस परियोजना का शंखनाद किया गया, तब इसे महज विकास और व्यापार का एक सुनहरा सपना कहकर प्रचारित किया गया था। विकासशील देशों को लगा कि उनकी किस्मत चमकने वाली है क्योंकि बिना किसी लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया और कड़े पश्चिमी नियमों के उन्हें झटके में भारी-भरकम फंड मिलने लगा था।
लेकिन इसके पीछे का गणित बेहद शातिर था। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी महाशक्ति ने दूसरे देशों को अपने पाले में खींचने की कोशिश की है, उसने हमेशा मदद का मुखौटा पहना है। चीन ने ठीक यही पैंतरा अपनाया। कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों के पास बुनियादी ढांचे यानी बुनियादी संरचना की भारी कमी थी। बंदरगाह, हाईवे, और पावर प्लांट जैसी परियोजनाओं के नाम पर बीजिंग ने अपने बैंकों के दरवाजे खोल दिए। यह कर्ज महज़ पैसे का लेन-देन नहीं था, बल्कि यह एक ऐसा फंदा था जो धीरे-धीरे कसता चला गया। विकास के इस आकर्षक मुखौटे के पीछे छिपे भू-राजनीतिक इरादों को तब तक कोई भाप नहीं पाया जब तक कर्जदार देश पूरी तरह घिर नहीं चुके थे।
किस तरह बुना जाता है यह आर्थिक मकड़जाल: चरण-दर-चरण प्रक्रिया
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे पहला चरण होता है लक्षित देश की कमजोरियों का सटीक आकलन करना। चीन उन देशों को चुनता है जिनकी सरकारें वित्तीय रूप से जूझ रही होती हैं या जिन्हें तत्काल भारी निवेश की दरकार होती है। पश्चिमी वित्तीय संस्थान जैसे कि विश्व बैंक या आईएमएफ पारदर्शिता, भ्रष्टाचार-विरोधी नीतियों और कड़े सुधारों की शर्त रखते हैं, जिससे कई देश कतराते हैं। यहीं पर चीन बिना किसी सवाल-जवाब के आसानी से पैसा देने का लालच देकर मैदान में उतरता है।
दूसरे चरण में, भारी-भरकम ऋण स्वीकृत किया जाता है, लेकिन इसके साथ कुछ गुप्त और कठोर शर्तें जुड़ी होती हैं। इन शर्तों में अक्सर यह अनिवार्य होता है कि परियोजना के निर्माण के लिए ठेकेदार, इंजीनियर और मजदूर सिर्फ चीन से ही आएंगे। इससे वह पैसा घूम-फिरकर वापस चीनी अर्थव्यवस्था में ही चला जाता है, और कर्जदार देश के सिर पर मूलधन के साथ-साथ भारी ब्याज का बोझ लद जाता है।
तीसरा चरण तब शुरू होता है जब परियोजनाएं उम्मीद के मुताबिक मुनाफा नहीं कमा पातीं या उनकी लागत आसमान छूने लगती है। बंदरगाह या एयरपोर्ट जैसी बड़ी संरचनाएं अक्सर शुरुआती दौर में घाटे का सौदा साबित होती हैं। जब देश किस्तों का भुगतान करने में असमर्थ हो जाते हैं, तब चीन वित्तीय सहायता या रीफाइनेंसिंग के नाम पर बेहद चालाकी से रणनीतिक परिसंपत्तियों को अपने नियंत्रण में ले लेता है। यही वह बिंदु है जहां आर्थिक कूटनीति खुलकर भू-राजनीतिक दबाव में बदल जाती है।
श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह: एक जीवंत और चेतावनी भरा उदाहरण
इस पूरी कार्यप्रणाली को समझने के लिए श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह सबसे सटीक और जीवंत मामला है। हिंद महासागर के बेहद अहम समुद्री मार्ग पर स्थित इस बंदरगाह के विकास के लिए श्रीलंका ने चीनी बैंकों से भारी कर्ज लिया था। उम्मीद यह थी कि यह मेगा प्रोजेक्ट देश की अर्थव्यवस्था में क्रांति ला देगा और मालवाहक जहाजों का तांता लग जाएगा।
हालांकि, वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट निकली। उम्मीद के मुताबिक यातायात और राजस्व न मिलने के कारण श्रीलंका सरकार कर्ज का ब्याज चुकाने में बुरी तरह विफल हो गई। जब संकट गहराया, तो बीजिंग ने मदद के नाम पर एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसे ठुकराना श्रीलंका के लिए असंभव था। साल 2017 में एक समझौते के तहत श्रीलंका को मजबूरन उस बंदरगाह और उसके आसपास की 15,000 एकड़ जमीन को 99 साल के लंबे पट्टे पर चीन को सौंपना पड़ा। यह घटना पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मिसाल बन गई कि कैसे आर्थिक बदहाली का फायदा उठाकर संप्रभुता पर कब्जा किया जाता है।
What experts say about it
अंतरराष्ट्रीय मामलों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह रणनीति केवल व्यावसायिक लाभ कमाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर अपनी महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को पूरा करने का एक सुनियोजित तरीका है। विशेषज्ञों के अनुसार, बीजिंग ऐसे देशों को चुनता है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिन्हें पारंपरिक पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं जैसे विश्व बैंक या अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण मिलने में कठिनाई होती है। चीन बिना कड़े प्रशासनिक या मानवाधिकार सुधारों की शर्त रखे आसानी से भारी-भरकम ऋण उपलब्ध करा देता है, जिससे विकासशील देश उसकी वित्तीय गिरफ्त में आसानी से फंस जाते हैं। विश्लेषक इसे "डेट-ट्रैप कूटनीति" करार देते हैं, जिसके तहत कर्ज चुकाने में असमर्थ होने पर विकासशील देशों की रणनीतिक संपत्तियों, बंदरगाहों और खदानों पर परोक्ष नियंत्रण स्थापित कर लिया जाता है। कई थिंक-टैंक इस बात की चेतावनी भी देते हैं कि इस प्रकार की ऋण नीति से छोटे देशों की राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या चीन जानबूझकर विकासशील देशों को कर्ज के जाल में फंसाता है?
उत्तर: पश्चिमी देशों और कई स्वतंत्र वित्तीय शोध संस्थानों का आरोप है कि चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) परियोजना के तहत दिए जाने वाले ऋण जानबूझकर ऐसी अव्यवहार्य परियोजनाओं पर खर्च कराए जाते हैं जो तुरंत मुनाफा नहीं कमातीं, जिससे देश कर्ज चुकाने में विफल हो जाते हैं। हालांकि, बीजिंग इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता है और इसे आपसी सहयोग तथा बुनियादी ढांचे के विकास का निष्पक्ष प्रयास बताता है।
प्रश्न 2: कर्ज न चुका पाने की स्थिति में चीन क्या कदम उठाता है?
उत्तर: ऋण चुकाने में विफल रहने पर चीन संबंधित देश की महत्वपूर्ण और रणनीतिक संपत्तियों को लंबी अवधि के पट्टे पर अपने नियंत्रण में ले लेता है, जैसा कि श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह के मामले में देखा गया था, या फिर वह कड़े पुनर्गठन समझौते थोपकर अपनी शर्तों पर उन देशों के संसाधनों का उपयोग करता है।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।