क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका पर वर्तमान में लगभग 39 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का भारी-भरकम सार्वजनिक ऋण लदा हुआ है? यह चौंकाने वाला आंकड़ा हर एक अमेरिकी नागरिक पर औसतन एक लाख डॉलर से ज्यादा का कर्ज साबित करता है। अमेरिका की कुल राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था यानी जीडीपी से भी कहीं अधिक यह कर्ज इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था कितने नाज़ुक और जटिल संतुलन पर टिकी हुई है, जिसे गहराई से समझना आज के समय में बेहद जरूरी हो गया है।

अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसका क्रमिक विकास

इस विराट ऋण की कहानी अमेरिका के शुरुआती दिनों से जुड़ी हुई है जब अट्ठारहवीं सदी के अंत में अमेरिकी क्रांतिकारी युद्ध के बाद देश गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा था। उस समय के वित्त मंत्री एलेक्जेंडर हैमिल्टन ने संघीय सरकार द्वारा राज्यों के पुराने युद्ध ऋणों को अपने ऊपर लेने की दूरदर्शी नीति बनाई थी। शुरुआती दशकों में यह कर्ज बहुत सीमित था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, देश के सामने आए बड़े संकटों ने इस वित्तीय आंकड़े को पूरी तरह बदल दिया। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब सैन्य खर्च और हथियारों के उत्पादन में भारी तेजी आई, तब अमेरिका का सार्वजनिक ऋण उसकी कुल अर्थव्यवस्था के अनुपात में अपने ऐतिहासिक उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इसके बाद के दशकों में शीत युद्ध के खर्चे, अंतरिक्ष कार्यक्रम, और विभिन्न आर्थिक मंदी से निपटने के लिए सरकारों ने लगातार बड़े पैमाने पर राजकोषीय घाटे का बजट अपनाया। पिछली एक सदी में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के विस्तार, स्वास्थ्य देखभाल बजट और बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर हर नए प्रशासन ने कर्ज के इस विशाल पहाड़ को और ऊंचा करने का काम किया, जो अब थमने का नाम नहीं ले रहा है।

अमेरिकी ऋण प्रणाली कैसे काम करती है और ट्रेजरी सिक्योरिटीज की भूमिका

यह समझना बेहद दिलचस्प है कि अमेरिका अपनी इस विशाल कर्ज की गाड़ी को आखिरकार कैसे सुचारू रूप से चला पाता है जबकि उसकी आमदनी खर्चों से हमेशा कम रहती है। पूरी प्रक्रिया अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ ट्रेजरी और फेडरल रिजर्व के समन्वय से चरणबद्ध तरीके से संचालित होती है। सबसे पहले, जब संघीय सरकार का बजट घाटे में जाता है और खर्च चलाने के लिए धन कम पड़ता है, तब ट्रेजरी विभाग आधिकारिक तौर पर ट्रेजरी बॉन्ड, नोट्स और बिल्स जारी करके वैश्विक बाजार में निवेशकों को आमंत्रित करता है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशक जैसे कि विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक, पेंशन फंड, और निजी वित्तीय संस्थान इन सरकारी प्रतिभूतियों को खरीदते हैं, जिसके बदले वे अमेरिकी सरकार को अपना पैसा उधार देते हैं। इन ट्रेजरी बॉन्ड्स को दुनिया भर में सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है क्योंकि अमेरिकी सरकार की भुगतान क्षमता पर वैश्विक वित्तीय बाजारों का अटूट भरोसा रहता है। इसके बाद, सरकार इस जुटाई गई पूंजी का उपयोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन, सैन्य बजट, बुनियादी विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं को पूरा करने के लिए करती है। जब इन बॉन्ड्स की परिपक्वता अवधि पूरी होती है, तो सरकार निवेशकों को मूलधन के साथ तयशुदा ब्याज चुकाती है, और यदि नया धन जुटाना हो तो पुराने कर्ज को चुकाने के लिए अक्सर नए बॉन्ड्स जारी करके चक्र को निरंतर घुमाती रहती है।

एक व्यावहारिक उदाहरण: वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड का प्रभाव

इस पूरी व्यवस्था की वास्तविक कार्यप्रणाली को एक सटीक मिसाल के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि जापान का केंद्रीय बैंक या दुनिया का कोई अन्य बड़ा वित्तीय संस्थान अपने पास मौजूद अतिरिक्त विदेशी मुद्रा भंडार को पूरी तरह सुरक्षित रखना चाहता है, तो वह सबसे भरोसेमंद विकल्प के रूप में अमेरिकी ट्रेजरी बिल्स में अरबों डॉलर का निवेश करता है। इस प्रकार निवेशक अमेरिका को नकद ऋण मुहैया कराते हैं और बदले में उन्हें निश्चित ब्याज मिलने का आश्वासन मिलता है। अमेरिकी सरकार इस प्राप्त धन से अपने विभिन्न बजट घाटे को पाटती है और घरेलू अर्थव्यवस्था में तरलता बनाए रखती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के प्रमुख वैश्विक मुद्रा होने के कारण, पूरी दुनिया के देश इस कर्ज के पहिये को परोक्ष रूप से गति देते रहते हैं, क्योंकि हर देश को अपने अंतरराष्ट्रीय लेन-देन और कच्चे तेल की खरीद के लिए डॉलर की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि भारी-भरकम कर्ज के बावजूद अमेरिका वैश्विक वित्त बाजार में अपनी साख बचाए रखता है, हालांकि भविष्य में ब्याज दरों के बढ़ने से इस ऋण का सर्विसिंग कॉस्ट यानी ब्याज चुकाने का खर्च देश के कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा हड़पने लगा है।

विशेषज्ञ इस पर क्या कहते हैं?

अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों के बीच अमेरिका के बढ़ते कर्ज को लेकर दो तरह के विचार पाए जाते हैं। एक पक्ष का मानना है कि चूंकि अमेरिकी डॉलर वैश्विक रिजर्व मुद्रा है और अमेरिकी बॉन्ड को सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है, इसलिए देश के लिए भारी कर्ज उठाना तब तक सुरक्षित है जब तक उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, अमेरिकी सरकार आसानी से नए बॉन्ड बेचकर पुराना कर्ज चुका सकती है।

इसके विपरीत, दूसरा पक्ष चेतावनी देता है कि अनियंत्रित गति से बढ़ रहा यह कर्ज भविष्य में एक बड़े वित्तीय संकट का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब कर्ज पर चुकाया जाने वाला ब्याज देश के कुल बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन जाता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे जरूरी विकास कार्यों के लिए बहुत कम फंड बचता है। यदि निवेशकों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भरोसा कम हुआ, तो वैश्विक बाजारों में हड़कंप मच सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या अमेरिका कभी दिवालिया हो सकता है?

तकनीकी रूप से, अमेरिकी सरकार के पास अपने कर्ज का भुगतान करने के लिए अमेरिकी डॉलर छापने की असीमित शक्ति है, इसलिए वह पारंपरिक अर्थों में दिवालिया नहीं हो सकती। हालांकि, अत्यधिक कर्ज छापने या भुगतान न कर पाने की स्थिति (जिसे 'डिफ़ॉल्ट' कहा जाता है) से डॉलर का मूल्य तेजी से गिर सकता है, देश में भयंकर महंगाई आ सकती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है।

इस भारी-भरकम कर्ज का असर आम अमेरिकी नागरिक पर कैसे पड़ता है?

बढ़ते राष्ट्रीय कर्ज का सीधा असर आम लोगों के जीवन पर पड़ता है। जब सरकार भारी मात्रा में कर्ज लेती है, तो बाजार में ब्याज दरें बढ़ जाती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि नागरिकों के लिए घर खरीदना, कार का लोन लेना, या पढ़ाई के लिए कर्ज लेना काफी महंगा हो जाता है। इसके अलावा, सरकारी खजाने का अधिकांश हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाने से जनता के लिए मिलने वाली कल्याणकारी सेवाओं और सार्वजनिक सुविधाओं में कटौती होने लगती है।

क्या असीमित कर्ज के सहारे चलने वाली यह वैश्विक व्यवस्था अंततः ढह जाएगी, या अमेरिका हमेशा के लिए इस कर्ज के बोझ को संभालने का कोई रास्ता निकाल लेगा?