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भारतीय राज्यों की आर्थिक सेहत और उधारी के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तमिलनाडु वर्तमान में देश में कुल बकाया कर्ज के मामले में सबसे आगे चल रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और विभिन्न बजट दस्तावेजों के अनुसार, तमिलनाडु पर कुल कर्ज का बोझ 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, जिसके बाद उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का स्थान आता है। यह स्थिति केवल आकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के संघीय ढांचे में राज्यों के वित्तीय प्रबंधन, कल्याणकारी योजनाओं के वित्तपोषण और बुनियादी ढांचे के विकास के बीच एक जटिल संतुलन को दर्शाती है।
राज्यों पर कर्ज का बोझ और मुख्य आंकड़े
देश के विभिन्न राज्यों के वित्तीय दस्तावेजों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि कर्ज का कुल आकार हर जगह अलग-अलग है। कुल बकाया देनदारियों के लिहाज से तमिलनाडु शीर्ष पर है, जहां यह आंकड़ा 8.3 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। इसके ठीक बाद उत्तर प्रदेश लगभग 7.7 लाख करोड़ रुपये और महाराष्ट्र करीब 7.2 लाख करोड़ रुपये के कर्ज के साथ क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर काबिज हैं। इनके अलावा पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्य भी इस सूची में ऊपर हैं। हालांकि, केवल कुल राशि देखना ही पर्याप्त नहीं है; जब इन आंकड़ों की तुलना राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) से की जाती है, तो तस्वीर थोड़ी और गहरी हो जाती है। पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का कर्ज-जीडीपी अनुपात 40 प्रतिशत से भी ऊपर निकल चुका है, जो कि तय की गई सीमा से काफी अधिक है। इसके विपरीत, कुछ राज्य अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था और बेहतर राजस्व प्रबंधन के कारण इस मोर्चे पर थोड़ा बेहतर संतुलन बनाए रखने में सफल रहे हैं।
राज्यों की उधारी नीतियों और दृष्टिकोण में अंतर
राज्यों द्वारा कर्ज लेने के तौर-तरीकों और उनकी रणनीतियों में स्पष्ट भिन्नता देखने को मिलती है। कुछ राज्य अपनी विशाल आबादी और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर होने वाले भारी खर्च को पूरा करने के लिए बाजार उधारी का बड़े पैमाने पर सहारा लेते हैं। दूसरी तरफ, कुछ राज्य पूंजीगत व्यय यानी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जैसे सड़कों, पुलों और औद्योगिक गलियारों के निर्माण के लिए कर्ज जुटाते हैं, जिसे दीर्घकालिक निवेश माना जाता है। केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले 50 साल के ब्याज-मुक्त ऋणों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है, जिससे कई राज्यों को अपने विकास कार्यों को गति देने का मौका मिला है। हालांकि, जब बात उधारी के स्रोतों की आती है, तो पारंपरिक वित्तीय संस्थाओं और लोक लेखा के बजाय अब खुले बाजार से बॉन्ड के जरिए पैसा जुटाने का चलन काफी बढ़ गया है, जिससे ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर राज्य के खजाने पर पड़ता है।
बढ़ते कर्ज का जोखिम और वित्तीय अनुशासन की जरूरत
अनियंत्रित उधारी और बढ़ते राजकोषीय घाटे के कई दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं। जब राज्य अपनी आय से अधिक उधार लेना शुरू कर देते हैं, तो उनका एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्जों के ब्याज चुकाने में ही खर्च होने लगता है, जिसे वित्तीय भाषा में 'कमिटेड एक्सपेंडिचर' कहा जाता है। इसके कारण स्वास्थ्य, शिक्षा और नवीन विकास कार्यों के लिए आवंटन कम हो जाता है। यदि समय रहते राज्यों ने अपने राजस्व संग्रह को मजबूत नहीं किया और सब्सिडी तथा मुफ्त की योजनाओं पर लगाम नहीं लगाई, तो यह स्थिति गंभीर वित्तीय संकट का रूप ले सकती है। दीर्घकालिक स्थिरता के लिए यह आवश्यक है कि राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के दायरे में रहकर ही नीतियां बनाई जाएं, ताकि भावी पीढ़ियों पर अनुचित आर्थिक बोझ न पड़े।
एक ऐसा छिपा हुआ सच जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं
जब भी हम राज्यों पर चढ़े कर्ज की बात करते हैं, तो ध्यान सिर्फ कुल आंकड़े यानी कुल कर्ज (Total Debt) पर जाता है। लेकिन असली और बेहद चौंकाने वाला सच तब सामने आता है जब हम यह देखते हैं कि राज्य अपने राजस्व (Revenue) का कितना हिस्सा सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने (Interest Payment) में खर्च कर रहे हैं। यही वह पैमाना है जो किसी राज्य की असली आर्थिक सेहत का खुलासा करता है। कई बार बड़े आकार और बड़ी अर्थव्यवस्था वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र का कुल कर्ज का आंकड़ा बड़ा दिखाई देता है, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था (GSDP) का दायरा भी बहुत विशाल होता है। इसके विपरीत, कुछ छोटे या मध्यम आकार के राज्य अपने कुल राजस्व का 35 से 42 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ ब्याज भरने में गंवा देते हैं। इसका मतलब यह है कि जनता से वसूले जाने वाले टैक्स के पैसों का एक बहुत बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में लगने के बजाय सीधे वित्तीय संस्थानों और बैंकों की तिजोरी में ब्याज के रूप में चला जाता है। इस स्थिति को वित्तीय संकट की शुरुआत माना जाता है, क्योंकि जब कमाई का एक बड़ा हिस्सा कर्ज के चक्र को चलाने में ही खर्च हो जाता है, तो अस्पतालों, स्कूलों और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के निर्माण के लिए बहुत कम संसाधन बच पाते हैं। यही वह अनकहा पहलू है जिसे आम नागरिक अक्सर भूल जाते हैं, लेकिन अर्थशास्त्रियों के लिए यह सबसे बड़ी चिंता का विषय होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: क्या किसी राज्य के लिए कर्ज लेना पूरी तरह से गलत होता है?
उत्तर: नहीं, यदि कर्ज का उपयोग उत्पादक कार्यों जैसे सड़क, बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में किया जाए जिससे भविष्य में आय बढ़े, तो यह फायदेमंद होता है। लेकिन रोजमर्रा के खर्चों या मुफ्त की योजनाओं के लिए कर्ज लेना खतरनाक है।
प्रश्न 2: जीडीपी और कर्ज के अनुपात (Debt-to-GSDP Ratio) का क्या मतलब है?
उत्तर: यह अनुपात बताता है कि राज्य की कुल आर्थिक उत्पादन क्षमता के मुकाबले उस पर कितना कर्ज है। आमतौर पर इसे 25% से कम रखना सुरक्षित माना जाता है।
प्रश्न 3: क्या केंद्र सरकार राज्यों के कर्ज चुकाने में मदद करती है?
उत्तर: केंद्र सरकार राज्यों को समय-समय पर विशेष वित्तीय पैकेज और कम ब्याज पर दीर्घकालिक ऋण देती है, लेकिन मुख्य जिम्मेदारी राज्य के अपने वित्तीय प्रबंधन की होती है।
प्रश्न 4: आम नागरिक पर राज्य के कर्ज का क्या असर पड़ता है?
उत्तर: अत्यधिक कर्ज के कारण राज्य सरकारों को या तो विकास कार्य रोकने पड़ते हैं या फिर जनता पर अधिक कर (Taxes) और बिजली-पानी जैसी सेवाओं के बढ़े हुए दाम थोपने पड़ते हैं।
निष्कर्ष और हमारी राय
निष्कर्ष के तौर पर, सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि किस राज्य पर सबसे ज्यादा कर्ज का बड़ा आंकड़ा है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि वह राज्य अपनी वित्तीय स्थिति को संभालने के लिए कितने गंभीर कदम उठा रहा है। हमारी स्पष्ट राय यह है कि राज्यों को लोकलुभावन और गैर-जरूरी खर्चों पर तुरंत लगाम लगानी चाहिए। जब तक सरकारें वित्तीय अनुशासन (Fiscal Discipline) को प्राथमिकता नहीं देंगी, तब तक कागजी विकास के पीछे छिपा यह कर्ज का पहाड़ आम जनता के भविष्य पर भारी पड़ता रहेगा।
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