क्या आपको पता है कि हर एक सेकंड में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज औसतन 50,000 डॉलर से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है? यह आंकड़ा महज एक संख्या नहीं, बल्कि एक आर्थिक सुनामी है। वर्तमान में, अमेरिका का कुल राष्ट्रीय कर्ज 35 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है, जो इस देश की कुल जीडीपी से भी अधिक है। यह स्थिति इतनी विकराल है कि हर अमेरिकी नागरिक पर आज लगभग 1,00,000 डॉलर से अधिक का कर्ज का भार है।

इतिहास के पन्नों में छिपा कर्ज का बीजारोपण

अमेरिकी कर्ज की कहानी कोई आज की नहीं है, इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। 1776 में देश की स्थापना के बाद से ही, सरकारी खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज लेना एक अनिवार्य नीति बन गई थी। शुरुआत में, ये कर्ज युद्धों को लड़ने और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए लिए गए थे। अलेक्जेंडर हैमिल्टन, जो अमेरिका के पहले वित्त सचिव थे, का मानना था कि एक "पवित्र कर्ज" देश की साख को मजबूत करता है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, युद्धों की लागत और सामाजिक कल्याण योजनाओं का विस्तार इस कर्ज को एक अनियंत्रित लूप में ले गया। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस कर्ज में भारी उछाल आया, लेकिन उस समय अर्थव्यवस्था की विकास दर इसे संभालने में सक्षम थी। आज स्थिति यह है कि सरकार को पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ रहा है, जो इसे एक अनंत चक्र में फंसाता जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से, सरकारें बजट घाटे को कम करने में विफल रही हैं, क्योंकि राजनीतिक रूप से कर बढ़ाना या खर्चों में कटौती करना किसी भी प्रशासन के लिए एक आत्मघाती कदम माना जाता है।

कर्ज का चक्र: कैसे चलता है यह जटिल तंत्र?

अमेरिका का यह वित्तीय ढांचा एक खास तरह की मशीनरी पर टिका है। सबसे पहले, अमेरिकी ट्रेजरी विभाग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए 'ट्रेजरी बॉन्ड' जारी करता है। ये बॉन्ड एक प्रकार का वादा है कि सरकार भविष्य में मूलधन के साथ ब्याज चुकाएगी। इन्हें दुनिया भर के निवेशक, अन्य देश और स्वयं अमेरिकी नागरिक खरीदते हैं। फेडरल रिजर्व, जिसे हम अमेरिका का केंद्रीय बैंक कह सकते हैं, अक्सर इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है। जब सरकार के पास खर्च करने के लिए पैसा कम होता है, तो ट्रेजरी विभाग बॉन्ड बेचता है। यदि पर्याप्त खरीदार नहीं मिलते, तो फेडरल रिजर्व पैसे छापकर इन बॉन्डों को खरीद लेता है, जिसे मौद्रिक विस्तार कहा जाता है। यह प्रक्रिया बाजार में तरलता तो बढ़ाती है, लेकिन मुद्रास्फीति का खतरा पैदा करती है। जैसे-जैसे कर्ज का ढेर बढ़ता है, ब्याज दरें अर्थव्यवस्था पर और भी भारी पड़ने लगती हैं। सरकार को हर साल अरबों डॉलर केवल अपने पुराने कर्ज के ब्याज के रूप में चुकाने पड़ते हैं। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य या बुनियादी ढांचे पर खर्च हो सकता था, लेकिन यह सीधे उन संस्थाओं की जेब में चला जाता है जिन्होंने सरकार को कर्ज दिया है। यह तंत्र इस भरोसे पर टिका है कि अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था की ताकत के कारण हमेशा भुगतान करने में सक्षम रहेगा।

एक कड़वा उदाहरण: बजट घाटे का गणित

इसे समझने के लिए एक साधारण उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए एक परिवार है जिसकी सालाना कमाई 50,000 डॉलर है, लेकिन उनका खर्च 80,000 डॉलर है। हर साल, यह परिवार 30,000 डॉलर का नया कर्ज लेता है। कुछ वर्षों में, उनकी कुल जमा पूंजी पर ब्याज का बोझ इतना अधिक हो जाता है कि उनकी पूरी कमाई केवल ब्याज चुकाने में ही चली जाती है। अमेरिका के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। यदि हम हाल के वर्षों पर गौर करें, तो अमेरिका का बजट घाटा इतना बड़ा हो गया है कि वह देश की वार्षिक कर आय से भी बहुत ज्यादा है। 2023 और 2024 के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका ने केवल ब्याज चुकाने पर ही लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च किए, जो कि देश के रक्षा बजट से भी ज्यादा है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जहां सरकार को अपनी बुनियादी सेवाओं को चलाने के लिए और अधिक कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। जब देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर, ब्याज दर की तुलना में धीमी होती है, तो कर्ज का यह राक्षस और भी बड़ा होता जाता है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक बहुत बड़ी आर्थिक चुनौती बनकर खड़ा है।

विशेषज्ञों की राय: क्या यह महाकर्ज अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है?

अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों के बीच अमेरिकी कर्ज को लेकर दो प्रमुख विचारधाराएं हैं। विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग चेतावनी देता है कि कर्ज का वर्तमान स्तर बेहद खतरनाक और अस्थिर हो चुका है। Congressional Budget Office (CBO) और प्रमुख वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि हर साल कर्ज के ब्याज भुगतान पर खर्च होने वाली ट्रिलियन डॉलर की राशि अब रक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ रही है। यदि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो अमेरिका को पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए भी लगातार नया कर्ज लेना पड़ेगा, जो अंततः एक गंभीर आर्थिक संकट को जन्म दे सकता है।

दूसरी ओर, कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब तक अमेरिकी डॉलर दुनिया की वैश्विक रिजर्व मुद्रा है, तब तक अमेरिका के डिफ़ॉल्ट होने का कोई तात्कालिक खतरा नहीं है। दुनिया भर के निवेशक, केंद्रीय बैंक और संस्थान अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड को सबसे सुरक्षित संपत्ति मानते हैं। हालांकि, सभी विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि बिना राजकोषीय अनुशासन के यह स्थिति अनंत काल तक नहीं चल सकती।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. अमेरिका पर सबसे ज्यादा कर्ज किस देश का है?

आम धारणा के विपरीत, अमेरिकी सरकार का सबसे बड़ा कर्जदाता कोई विदेशी देश नहीं, बल्कि खुद अमेरिकी जनता, वहां के पेंशन फंड, बैंक और फेडरल रिजर्व हैं। हालांकि, विदेशी कर्जदाताओं की सूची में जापान और चीन सबसे ऊपर हैं। जापान वर्तमान में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड का सबसे बड़ा विदेशी धारक है, जिसके पास 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का अमेरिकी कर्ज है। चीन दूसरे स्थान पर है, यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में चीन ने अमेरिकी कर्ज में अपनी हिस्सेदारी को धीरे-धीरे कम किया है।

2. यदि अमेरिका अपना कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाए तो क्या होगा?

यदि अमेरिका कभी अपने कर्ज के भुगतान में डिफ़ॉल्ट करता है, तो इसका असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो सकती है। अमेरिकी डॉलर के मूल्य में ऐतिहासिक गिरावट आएगी, वैश्विक शेयर बाजार धराशायी हो जाएंगे और दुनिया भर में ब्याज दरें तेजी से बढ़ेंगी। अमेरिका की साख कम होने से वैश्विक व्यापार रुक सकता है। यही कारण है कि अमेरिकी संसद (कॉन्ग्रेस) हर बार समय रहते 'डेब्ट सीलिंग' यानी कर्ज लेने की कानूनी सीमा को बढ़ा देती है ताकि डिफ़ॉल्ट की स्थिति से बचा जा सके।

एक विचारणीय प्रश्न

जब दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था का संपूर्ण ढांचा ही ट्रिलियन डॉलर के अंतहीन कर्ज पर टिका हुआ है, तो क्या यह व्यवस्था आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ है या डॉलर की यह वैश्विक बादशाहत केवल एक बड़ा आर्थिक गुब्बारा बनकर रह गई है?