बॉम्बे के अंडरवर्ल्ड के इतिहास को खंगालने पर जिस शख्स का नाम सबसे पहले जेहन में उभरता है, वह हाजी मस्तान था। वह महानगर का वह पहला माफिया सरगना था जिसने बिना किसी सीधे कत्ल या बंदूक की नोंक के बिना अपराध की दुनिया पर बेताज बादशाहत कायम की थी। जब वह साल 1944 में दक्षिण भारत के एक छोटे से गांव से मुंबई आया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह साधारण कुली आगे चलकर शहर की सूरत बदल देगा। इस लेख के पहले भाग में हम उस दौर की रूपरेखा, मुख्य आंकड़ों और अपराध जगत की उन शख्सियतों का विश्लेषण करेंगे जिन्होंने बंबई की गलियों में अपनी समानांतर हुकूमत स्थापित की थी।

बॉम्बे के अंडरवर्ल्ड के शुरुआती दौर के मुख्य आंकड़े, तस्करी का टर्नओवर और आर्थिक प्रभाव

साठ और सत्तर के दशक में बॉम्बे का बंदरगाह क्षेत्र अवैध व्यापार और तस्करों का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका था। आधिकारिक दस्तावेजों और खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, उस कालखंड में सोने, चांदी, घड़ियों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की तस्करी का सालाना कारोबार करोड़ों रुपये के पार पहुंच गया था। अकेले हाजी मस्तान के सिंडिकेट का नेटवर्क गुजरात के तटों से लेकर मुंबई के डॉकयार्ड तक फैला हुआ था, जहां से हर महीने भारी मात्रा में विदेशी माल देश की सीमा में प्रवेश करता था। शुरुआती दौर में इस अवैध साम्राज्य का टर्नओवर इतना विशाल था कि इसने भारतीय अर्थव्यवस्था के समानांतर एक ऐसी अर्थव्यवस्था को जन्म दिया जिसपर लगाम कसना उस समय की पुलिस के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया था। इन आंकड़ों में केवल माल की ढुलाई शामिल नहीं थी, बल्कि इसमें बॉलीवुड फिल्मों की फाइनेंसिंग और मुंबई की मंहगी रियल एस्टेट संपत्तियों में किया जाने वाला वह काला धन भी शामिल था जो अपराध की दुनिया से निकलकर सफेदपोश कारोबार में खपाया जा रहा था। इस संगठित सिंडिकेट ने न केवल स्थानीय अपराध का दायरा बढ़ाया, बल्कि महानगर के आर्थिक संतुलन को भी गहराई से प्रभावित किया।

तस्करी के दिग्गजों की तुलना — हाजी मस्तान, करीम लाला और वर्दराजन मुदालियार के तौर-तरीके

मुंबई के शुरुआती अंडरवर्ल्ड को समझने के लिए उन तीन बड़े स्तंभों की कार्यप्रणाली का तुलनात्मक अध्ययन करना जरूरी है जिन्होंने मिलकर पूरे शहर को अपने प्रभाव क्षेत्र में बांट लिया था। एक तरफ हाजी मस्तान था जो अपनी शानदार सफेद पोशाक, मर्सिडीज कारों और बॉलीवुड सितारों के साथ गहरे संपर्कों के लिए जाना जाता था। मस्तान मुख्य रूप से समुद्री रास्तों से होने वाली तस्करी का मास्टरमाइंड था और कूटनीतिक समझौतों के जरिए अपने साम्राज्य को चलाता था। दूसरी तरफ करीम लाला था, जो अफगानी मूल का एक ताकतवर पठान था और जिसकी पकड़ भायखला तथा दक्षिण मुंबई के इलाकों पर थी। करीम लाला का तरीका खौफ, जुआ अडوبों के संचालन और वसूली पर आधारित था जहां वह सीधे तौर पर हिंसा का इस्तेमाल करने से नहीं कतराता था। तीसरा प्रमुख नाम वर्दराजन मुदालियार का था जिसे दक्षिण भारतीयों के बीच 'वरदा भाई' या 'काला बाबू' के रूप में पूजा जाता था। वर्दराजन ने माटुंगा और धारावी के इलाकों में अपनी समानांतर पंचायतें चलाईं और गरीबों के मसीहा की छवि गढ़ते हुए जुए और अवैध शराब के धंधे पर एकाधिकार जमाया। इन तीनों दिग्गजों के बीच एक अनकहा समझौता था जिसके कारण वे लंबे समय तक बिना किसी बड़े अंदरूनी संघर्ष के मुंबई की सत्ता पर काबिज रहे।

एक दौर का पतन और सबक — शुरुआती अंडरवर्ल्ड के उदय से जुड़ी वह बड़ी गलतियां

अपराध की दुनिया के शुरुआती संस्थापकों की जीवनशैली और उनके पतन के कारणों का अध्ययन करने पर कई ऐसे गंभीर सबक मिलते हैं जो समाज और न्याय व्यवस्था के लिए एक चेतावनी की तरह हैं। इन डॉन ने शुरुआत में खुद को कानून की पकड़ से दूर रखने के लिए सामाजिक कार्यों और फिल्मी हस्तियों के साथ मेल-मिलाप का मुखौटा पहन लिया था, लेकिन उनका यह प्रभाव अंततः राज्य की संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा बन गया। सबसे बड़ी गलती जो इन सिंडिकेट्स ने की, वह यह थी कि उन्होंने अपने साम्राज्य को विस्तार देने के लिए युवा पीढ़ी और छोटे अपराधियों को संरक्षण देना शुरू कर दिया, जिसने आगे चलकर दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन जैसे खतरनाक और खूनी गैंगस्टरों को जन्म दिया। जब सत्ता और ताकत का नशा चरम पर पहुंचा, तो आपसी रंजिशों और खूनी संघर्षों ने उस महानगर को दहला दिया जो कभी शांति और व्यापार के लिए जाना जाता था। इतिहास इस बात का गवाह है कि अवैध तरीकों से खड़ी की गई हर महान साम्राज्यवादी इमारत अंततः आंतरिक कलह और कठोर कानूनी कार्रवाई के बोझ तले ढह जाती है, और बॉम्बे के इन तथाकथित गॉडफादर्स का अंत भी इसी ऐतिहासिक सच्चाई का प्रमाण साबित हुआ।