संगीत की दुनिया रहस्यों और जादू से भरी हुई है, जहां हर एक धुन इंसान के दिल को छू जाती है। क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर के अनगिनत संगीत और मधुर गीत महज़ कुछ ही बुनियादी ध्वनियों के इर्द-गिर्द घूमते हैं? यदि आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि एक सप्तक में कितने सुर होते हैं, तो इसका सीधा और सटीक जवाब यह है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक सप्तक के भीतर कुल सात शुद्ध और पांच विकृत यानी बारह कुल सुर होते हैं, जो मिलकर संगीत की पूरी इमारत खड़ी करते हैं।
भारतीय संगीत पद्धति का इतिहास सदियों पुराना है और इसका उद्गम वेदों तथा प्राचीन ग्रंथों से जुड़ा हुआ माना जाता है। संगीत के इन सात मूल स्वरों—षड्यंत्र, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद (जिन्हें संक्षेप में सा, रे, ग, म, प, ध, नि कहा जाता है)—की परिकल्पना प्राचीन काल के ऋषियों और संगीतज्ञों ने प्रकृति की ध्वनियों से प्रेरित होकर की थी। ऐसा माना जाता है कि ये सातों स्वर प्रकृति के विभिन्न जीवों और पक्षियों की बोलियों से मेल खाते हैं। उदाहरण के लिए, मोर की आवाज़ को 'षडज' या 'सा' के समकक्ष माना गया है, पपीहा 'मध्यम' की याद दिलाता है और कोयल की कूक 'पंचम' स्वर का अहसास कराती है। सदियों पहले सामवेद के समय से ही इन स्वरों का प्रयोग मंत्रोच्चार और संगीत रचना में होता आ रहा है, जो धीरे-धीरे विकसित होकर आज के आधुनिक शास्त्रीय संगीत का आधार बन गया है।
अब यह समझना बेहद जरूरी है कि यह पूरी प्रणाली व्यावहारिक रूप से कैसे काम करती है और इसके चरण क्या हैं। संगीत के अध्ययन की शुरुआत हमेशा बुनियादी नियमों को समझने से होती है। सबसे पहले, संगीतकार या विद्यार्थी अपने वोकल कॉर्ड या वाद्ययंत्र को 'सा' (षडज) स्वर पर स्थिर करता है, क्योंकि यह बाकी सभी स्वरों का केंद्रबिंदु होता है। इसके बाद, क्रमानुसार रे, ग, म, प, ध और नि का अभ्यास किया जाता है। इन सात शुद्ध स्वरों के अलावा, पांच स्वर ऐसे होते हैं जो अपने मूल स्थान से थोड़े ऊंचे या नीचे होते हैं, जिन्हें कोमल और तीव्र स्वर यानी विकृत स्वर कहा जाता है—इनमें कोमल रे, कोमल ग, तीव्र म, कोमल ध और कोमल नि शामिल हैं। इस प्रकार, सातों शुद्ध और पांचों विकृत स्वरों को मिलाकर कुल बारह स्वर बनते हैं। जब हम 'सा' से शुरू करके इन सभी बारह स्वरों को पार करते हुए अगले ऊंचे 'सा' तक पहुंचते हैं, तो इस पूरे चक्र को एक 'सप्तक' कहा जाता है। रियाद के दौरान छात्र एक-एक स्वर को साधते हैं, सुरों के उतार-चढ़ाव को कान से पहचानते हैं और तब जाकर वे किसी राग की रचना या प्रस्तुति में निपुण होते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया को एक वास्तविक और व्यावहारिक उदाहरण के जरिए और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि आप हारमोनियम या गिटार लेकर बैठे हैं और आपने 'मध्य सप्तक' के 'सा' बटन को दबाया। यह आपका शुरुआती बिंदु है। अब आप एक-एक कुंजी आगे बढ़ते हैं—कोमल रे, शुद्ध रे, कोमल ग, शुद्ध ग, शुद्ध म, तीव्र म, पंचम, कोमल ध, शुद्ध ध, कोमल नि, शुद्ध नि और अंत में तार सप्तक का 'सा'। यह एक बेहतरीन मिसाल है जो दिखाती है कि कैसे केवल सात मूल आधारों और उनके पांच सह-स्वरों के मेल से संगीतकार असीमित संख्या में धुनें, तानें और राग तैयार कर लेते हैं। ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजी वर्णमाला के केवल छब्बीस अक्षरों से दुनिया भर का विशाल साहित्य लिखा जाता है, वैसे ही इन बारह स्वरों के अनगिनत संयोजनों से संगीत की महान रचनाएं जन्म लेती हैं।
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