विषय-सूची
क्या आप जानते हैं कि दुनिया की हर भाषा को किसी न किसी जननी की तलाश रहती है, लेकिन कुछ ऐसी प्राचीन ध्वनियां हैं जो इतिहास के पन्नों में आज भी अनकही पहेली बनी हुई हैं? जब बात संस्कृत से भी पुरानी भाषा की आती है, तो विद्वानों के बीच सदियों से बहस छिड़ी है। सीधे शब्दों में कहें तो, तमिल, सुमेरियन और मिस्र की चित्रलिपियों को संस्कृत से भी प्राचीन माना जाता है, क्योंकि इनके लिखित प्रमाण समय की परतों को चीरकर सबसे पहले सामने आए थे।
मानव इतिहास के उस दौर की पृष्ठभूमि जब शब्दों ने पहली बार आकार लिया था
भाषा का सफर किसी महाकाव्य से कम रोमांचक नहीं है। प्राचीन काल में जब इंसानों ने अपनी भावनाओं को संकेतों से बाहर निकालकर ध्वनियों में पिरोना शुरू किया, तो सभ्यताओं की नींव पड़ी। मेसोपोटामिया की घाटी में सुमेरियन भाषा ने लगभग पांच हजार साल पहले कीलाक्षर लिपि के जरिए इतिहास के सबसे पुराने लिखित दस्तावेज रचे। उधर, भारतीय उपमहाद्वीप में तमिल भाषा का शास्त्रीय स्वरूप भी अत्यंत प्राचीन काल से मौखिक परंपराओं के रूप में जीवित रहा, जिसके संगम साहित्य के प्रमाण आज भी अचंभित करते हैं। इन भाषाओं का उद्भव केवल शब्दों का मेल नहीं था, बल्कि यह इंसानी चेतना के विकास का पहला ठोस दस्तावेज था। समय के साथ भौगोलिक बदलावों और व्यापारिक रिश्तों ने इन बोलियों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाया, जिससे कई नई उपभाषाएं जन्मीं। विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि कोई भी भाषा रातों-रात नहीं बनती, बल्कि सदियों के संघर्ष और मेल-मिलाप का नतीजा होती है।
प्राचीन काल में मौखिक परंपरा से लिखित लिपि तक भाषा के विकास का क्रम
भाषा के निर्माण और उसके विस्तार की प्रक्रिया बेहद दिलचस्प और क्रमिक होती है। सबसे पहले इंसानी समाजों ने अपने आसपास की आवाजों और प्राकृतिक ध्वनियों की नकल करते हुए मौखिक संकेतों का एक साझा कोष तैयार किया। यही मौखिक संप्रेषण पीढ़ियों दर पीढ़ियों आगे बढ़ता गया, जिसे हम मौखिक परंपरा कहते हैं। इसके बाद, बस्तियों के बसने और व्यापार के बढ़ने के साथ ही लेन-देन और हिसाब-किताब रखने की जरूरत महसूस हुई। यहीं से प्रतीकों और चित्रों का इस्तेमाल शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे मूर्तरूप लेकर लिपि में बदल गए। उदाहरण के लिए, मेसोपोटामिया के लोगों ने गीली मिट्टी की पट्टिकाओं पर सरकंडे की कलम से नुकीले निशान बनाकर कीलाक्षर लिपि को गढ़ा। हर प्रतीक किसी वस्तु या भाव का प्रतिनिधित्व करता था। जैसे-जैसे व्याकरण के नियम तय हुए, वाक्यों की संरचना स्पष्ट हुई और ध्वनियों का उच्चारण निश्चित हुआ, वैसे-वैसे भाषा ने अपनी मुकम्मल शक्ल अख्तियार की। इस पूरी प्रक्रिया में सदियों का श्रम और सामूहिक बौद्धिक विकास शामिल था।
संगम युग का जीवंत प्रमाण और प्राचीन तमिल भाषा का ऐतिहासिक संदर्भ
आइए दक्षिण भारत के उस स्वर्णिम काल की यात्रा करें जहां प्राचीन भाषा के जीवंत प्रमाण आज भी सुरक्षित हैं। संगम साहित्य इस बात का अकाट्य गवाह है कि तमिल भाषा का शास्त्रीय स्वरूप कितना पुराना और समृद्ध रहा है। ईसा पूर्व की शुरुआती शताब्दियों में रचे गए इन ग्रंथों में राजाओं के पराक्रम, प्रेम, समाज और प्रकृति का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण मिलता है। पुरातात्विक खुदाई में मिले मिट्टी के बर्तनों पर तमिल-ब्राह्मी लिपि के जो टुकड़े मिले हैं, उन्होंने यह साबित कर दिया कि यह भाषा सिर्फ बोलचाल तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसकी अपनी एक सुव्यवस्थित साहित्यिक परंपरा थी। इस भाषा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह आज भी आधुनिक रूप में जीवित है और दुनिया की सबसे पुरानी जीवित शास्त्रीय भाषाओं में शुमार की जाती है। इसका व्याकरण और शब्दावली इस बात का प्रमाण देते हैं कि प्राचीन मानव समाज कितना उन्नत और संवेदनशील था।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।