सदी दर सदी बीत चुकी है, और इंसान के जेहन में आज भी वही पुराना सवाल कौंधता है—क्या हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो शरीर के खाक होने के बाद भी जिंदा रहता है? चौंकाने वाली बात यह है कि दुनिया भर की आधुनिक प्रयोगशालाओं में आज भी इस अदृश्य चेतना को नापने के लिए गंभीर प्रयोग चल रहे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, मुख्यधारा का विज्ञान आत्मा जैसी किसी पारंपरिक और अलौकिक अवधारणा को भौतिक रूप से प्रमाणित नहीं मानता, लेकिन चेतना के मुमकिन पहलुओं को खारिज भी नहीं करता।

इतिहास की प्रयोगशाला से लेकर आधुनिक विज्ञान की पहेली तक का लंबा सफर

प्राचीन काल से ही दार्शनिकों ने शरीर और मन को अलग माना है, जिसे द्वैतवाद कहा जाता है। सुकरात से लेकर उपनिषदों तक, हर जगह आत्मा को शरीर का चालक बताया गया। लेकिन आधुनिक विज्ञान की नींव जब पक्की होने लगी, तो चीजें बदल गईं। सत्रहवीं सदी में रेने डेकार्ट ने प्रस्ताव रखा कि हमारी चेतना और भौतिक शरीर दो अलग चीजें हैं, जो पीनियल ग्रंथि के जरिए आपस में जुड़ी रहती हैं। यह वह शुरुआती बिंदु था जहां धर्म और दर्शन के दायरे से निकलकर चेतना विज्ञान की चौखट पर आ गई।

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में कुछ वैज्ञानिकों ने तो हद ही कर दी। अमेरिका के डॉक्टर डंकन मैकडौगल ने साल 1907 में कुछ ऐसे प्रयोग किए जिनमें मरने वाले इंसानों का वजन तौला गया। उनका दावा था कि मौत के ठीक बाद इंसान के वजन में इक्कीस ग्राम की कमी दर्ज की जाती है—यही वजन आत्मा का है। हालांकि, आधुनिक विज्ञान इस प्रयोग को पूरी तरह खारिज करता है क्योंकि इसमें नमूनों की संख्या बहुत कम थी और वैज्ञानिक कसौटी पर यह खरा नहीं उतरा। इसके बावजूद, इस तरह के विचित्र प्रयोगों ने यह साबित कर दिया कि इंसानी दिमाग इस रहस्य को सुलझाने के लिए किस हद तक जा सकता है।

चेतना और भौतिकी का वह समीकरण जिसे समझने की कोशिश वैज्ञानिक लगातार कर रहे हैं

अब सवाल यह उठता है कि अगर कोई पारंपरिक आत्मा नहीं है, तो फिर विचार, भावनाएं और यह स्व-बोध कहां से आता है? इसे समझने के लिए न्यूरोसाइंस और क्वांटम भौतिकी के रास्ते पर चलना होगा। प्रक्रिया बहुत दिलचस्प है और इसे चरणबद्ध तरीके से समझा जा सकता है। सबसे पहले, हमारे शरीर की अरबों कोशिकाएं और न्यूरॉन्स आपस में मिलकर विद्युत रासायनिक संकेत भेजते हैं। यही तंत्रिका तंत्र का जाल हमारे सोचने और महसूस करने की क्षमता को जन्म देता है।

अगले चरण में क्वांटम बायोलॉजिस्ट यह परखने लगे हैं कि क्या दिमाग के भीतर होने वाली सूक्ष्म प्रक्रियाएं क्वांटम स्तर पर काम करती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता रोजर पेन्रोज और एनेस्थेसियोजिस्ट स्टुअर्ट हमरॉफ ने 'ऑर्केस्ट्रेटेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन' यानी ऑर्क-ओआर थ्योरी दी। इसके मुताबिक, दिमाग के न्यूरॉन्स के अंदर मौजूद माइक्रोट्यूब्यूल्स क्वांटम जानकारी को स्टोर करते हैं। मौत के वक्त यह जानकारी नष्ट नहीं होती, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन हो जाती है। यह पूरी प्रक्रिया किसी जटिल गणितीय समीकरण जैसी है, जहां ऊर्जा कभी खत्म नहीं होती, बस उसका रूप बदल जाता है।

जब एक न्यूरोसर्जन ने कोमा के दौरान अपनी ही चेतना का ऐसा अनुभव किया जो विज्ञान को झकझोर गया

थ्योरी और प्रयोगशाला के आंकड़ों से आगे बढ़कर अगर किसी वास्तविक और ठोस उदाहरण की बात करें, तो डॉ. इबन एलेक्जेंडर की कहानी सबसे अनोखी है। वह खुद एक प्रतिष्ठित न्यूरोसर्जन थे और चेतना को दिमाग की महज एक रासायनिक प्रतिक्रिया मानते थे। एक दिन वे गंभीर मेनिंजाइटिस का शिकार हो गए और उनका सेरेब्रल कॉर्टेक्स यानी सोचने-समझने वाला हिस्सा पूरी तरह काम करना बंद कर चुका था। वे सात दिनों तक गहरे कोमा में रहे, जहां डॉक्टरों के मुताबिक उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी और उनका दिमाग मृतप्राय हो चुका था।

लेकिन जब वे होश में लौटे, तो उनके पास अनुभवों का एक ऐसा संसार था जिसने उनके पूरे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पलट दिया। उन्होंने बताया कि उस कोमा की अवस्था में भी वे एक अत्यंत स्पष्ट, खूबसूरत और जीवंत चेतना का हिस्सा थे, जो उनके भौतिक शरीर से पूरी तरह स्वतंत्र थी। उनके न्यूरॉन्स काम नहीं कर रहे थे, फिर भी उनकी यादें और उनका अहसास पहले से ज्यादा तीव्र था। उन्होंने अपनी इस आपबीती पर एक बेस्टसेलर किताब लिखी और आज वे इस बात की वकालत करते हैं कि चेतना सिर्फ दिमाग की मोहताज नहीं है। यह घटना आज भी न्यूरोसाइंस के सबसे बड़े अनसुलझे रहस्यों में गिनी जाती है, जो इस बहस को और हवा देती है कि क्या हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो इस नश्वर शरीर से बहुत परे है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

वैज्ञानिक समुदाय और दार्शनिकों के बीच आत्मा के अस्तित्व को लेकर दृष्टिकोण हमेशा से अलग और दिलचस्प रहे हैं। जहां भौतिकवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण चेतना को केवल मस्तिष्क के न्यूरोलॉजिकल और रासायनिक प्रक्रियाओं का परिणाम मानता है, वहीं क्वांटम भौतिकी के कुछ सिद्धांतों ने इस पर एक नई बहस छेड़ दी है। क्वांटम सिद्धांत के पैरोकार मानते हैं कि ब्रह्मांड में ऊर्जा का कभी नाश नहीं होता, और हो सकता है कि हमारे भीतर की चेतना भी उसी ऊर्जा का एक हिस्सा हो जो शरीर के नष्ट होने के बाद भी किसी रूप में बनी रहती है।

दूसरी ओर, आधुनिक तंत्रिका विज्ञान यानी न्यूरोसाइंस यह साबित करने का प्रयास करता है कि हमारी भावनाएं, यादें और व्यक्तित्व मस्तिष्क के विशिष्ट हिस्सों के काम करने के तरीके पर निर्भर करते हैं। यदि मस्तिष्क का कोई हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो व्यक्ति का व्यवहार और उसकी पहचान बदल जाती है। इसके बावजूद, न्यूरोसाइंस के पास भी इस बात का कोई पुख्ता जवाब नहीं है कि हमें आत्म-अनुभूति यानी 'मैं कौन हूँ' का अहसास कैसे होता है। यही कारण है कि आज भी कई वैज्ञानिक और विचारक इस विषय को विज्ञान की सीमाओं से परे मानते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या विज्ञान ने कभी आत्मा के वजन को मापने का प्रयास किया है?

हां, 20वीं सदी की शुरुआत में डंकन मैकडॉगल नामक एक चिकित्सक ने कुछ प्रयोग किए थे, जिनमें उन्होंने दावा किया था कि मृत्यु के तुरंत बाद मनुष्य के शरीर के वजन में लगभग 21 ग्राम की कमी आती है। उनका मानना था कि यह आत्मा का वजन हो सकता है। हालांकि, आधुनिक विज्ञान इन प्रयोगों को अवैज्ञानिक और अविश्वसनीय मानता है, क्योंकि उन प्रयोगों के आंकड़े बहुत छोटे थे और उनमें वैज्ञानिक कठोरता की भारी कमी थी। आज के समय में इस तरह के दावों को कोई प्रमाणिकता नहीं दी जाती है।

क्या क्वांटम भौतिकी आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करती है?

सीधे तौर पर नहीं। हालांकि, कुछ भौतिकविदों ने 'क्वांटम कॉन्शियसनेस' का सिद्धांत दिया है, जिसके तहत चेतना को ब्रह्मांड का एक मूलभूत हिस्सा माना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, चेतना केवल मस्तिष्क की उपज नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड के क्वांटम स्तर पर मौजूद हो सकती है। फिर भी, मुख्यधारा का वैज्ञानिक समुदाय इस पर संशय रखता है क्योंकि इसे प्रयोगशाला में किसी भी तरह से परखा या प्रमाणित नहीं किया जा सका है।

क्या चेतना केवल मस्तिष्क की एक रासायनिक दुर्घटना है या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा है जिसे विज्ञान अभी तक खोज नहीं पाया है?