जी हाँ, पारंपरिक मान्यताओं और कुछ हद तक पोषण विज्ञान के अनुसार, मूंगफली का सेवन स्तनपान कराने वाली माताओं में दूध के उत्पादन को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है। शिशु के जन्म के बाद हर माँ के मन में यह सवाल जरूर आता है कि ऐसा क्या खाया जाए जिससे दूध प्रचुर मात्रा में बने और बच्चे का पेट अच्छी तरह भर सके। भारतीय परिवारों में नई माताओं को मेवे और पौष्टिक आहार देने की पुरानी परंपरा रही है। इस लेख में हम इसी बात की गहराई से पड़ताल करेंगे कि क्या सचमुच मूंगफली लैक्टेशन यानी दुग्धस्रवण की प्रक्रिया को तेज करती है या यह केवल एक मिथक है।

पोषण और लैक्टेशन के आंकड़े: विज्ञान क्या कहता है?

स्तनपान के दौरान एक महिला को अपने सामान्य दिनों की तुलना में लगभग 450 से 500 कैलोरी अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। मूंगफली इस अतिरिक्त ऊर्जा की पूर्ति करने का एक बेहद किफायती और शानदार स्रोत है। सौ ग्राम मूंगफली में लगभग 25 से 26 ग्राम उच्च गुणवत्ता वाला प्लांट-बेस्ड प्रोटीन पाया जाता है, जो प्रसव के बाद शरीर की रिकवरी में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा, इसमें स्वस्थ वसा यानी हेल्दी फैट्स, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन भरपूर मात्रा में होते हैं। शोध बताते हैं कि जब स्तनपान कराने वाली माँ पर्याप्त मात्रा में कैलोरी और स्वस्थ वसा का सेवन करती है, तो हॉर्मोनल संतुलन बेहतर रहता है, जिससे प्रोलैक्टिन और ऑक्सीटोसिन हॉर्मोन का स्तर सुचारू रूप से बना रहता है। ये दोनों हॉर्मोन दुग्ध ग्रंथियों को सक्रिय करने और दूध के बहाव को नियंत्रित करने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाते हैं। यही कारण है कि आयुर्वेद और पोषण विशेषज्ञ स्तनपान के दौरान मूंगफली और अन्य नट्स को आहार में शामिल करने की सलाह देते हैं।

दूध बढ़ाने के अन्य विकल्प और पारंपरिक आहार बनाम मूंगफली

स्तनपान के दौरान दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए केवल मूंगफली ही एकमात्र विकल्प नहीं है, बल्कि इसके साथ कई अन्य पारंपरिक और आधुनिक आहार भी बेहद लोकप्रिय हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो मेथी के दाने, जिन्हें लेक्टोजेनिक एजेंट माना जाता है, सीधे तौर पर दूध के उत्पादन को ट्रिगर करते हैं। वहीं दूसरी ओर, बादाम और काजू जैसे मेवे शरीर को ताकत देते हैं और ऊर्जा का स्तर बनाए रखते हैं। मूंगफली की बात करें तो यह बादाम की तुलना में काफी सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने वाली सामग्री है, जिसे हर वर्ग की महिला अपनी डाइट में शामिल कर सकती है। कुछ माताएं बादाम का दूध या बादाम का हलवा पसंद करती हैं, तो वहीं कुछ भुनी हुई मूंगफली या मूंगफली की चिक्की खाना अधिक सुविधाजनक मानती हैं। दूध बढ़ाने के इन सभी विकल्पों में एक मुख्य समानता यह है कि ये सभी शरीर को आवश्यक फैटी एसिड प्रदान करते हैं। हालांकि, हर महिला का शरीर अलग होता है; किसी पर मेथी असरदार साबित होती है, तो किसी के लिए मूंगफली और बादाम का मिश्रण ज्यादा फायदेमंद रहता है। इसलिए अपनी जीवनशैली और पाचन क्षमता के अनुसार सही विकल्प का चयन करना ही सबसे समझदारी भरा कदम माना जाता है।

सावधानियां और संभावित जोखिम: क्या मूंगफली नुकसान भी कर सकती है?

हर अच्छी चीज के साथ कुछ सावधानियां जुड़ी होती हैं, और मूंगफली के मामले में यह बात और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सबसे बड़ा जोखिम एलर्जी का होता है। यदि परिवार में किसी को नट्स या मूंगफली से गंभीर एलर्जी का इतिहास रहा है, तो स्तनपान कराने वाली माँ को इसका सेवन बेहद सावधानी से करना चाहिए। माँ द्वारा खाई गई चीजें दूध के माध्यम से शिशु तक पहुँच सकती हैं, जिससे संवेदनशील बच्चों में पेट दर्द, गैस, या त्वचा पर चकत्ते जैसी समस्याएं उभर सकती हैं। इसके अलावा, बाजार में मिलने वाली नमकीन या भुनी हुई मूंगफली में सोडियम और प्रिजर्वेटिव्स की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो उच्च रक्तचाप या पानी की कमी का कारण बन सकती है। इसलिए हमेशा सादी, कच्ची या घर पर सूखी भुनी हुई मूंगफली का ही चयन करना बेहतर रहता है। यदि शिशु के पाचन तंत्र में किसी प्रकार की असामान्यता दिखे या बच्चे को लगातार दस्त या बेचैनी महसूस हो, तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए और अपने आहार में बदलाव करना चाहिए।