1. धरती की रचना और उसका क्रम

कुरान में धरती और ब्रह्मांड की रचना का जिक्र कई स्थानों पर आया है। इस्लामिक विद्वानों और टीकाकारों के अनुसार, अल्लाह ने इस पूरी कायनात को एक निश्चित योजना के तहत बनाया है।

  • छह कालखंडों (अवधियों) में सृजन: कुरान के अनुसार, आसमान और ज़मीन को 'छह दिनों' (अरबी में 'अय्याम', जिसका अर्थ लंबे कालखंड या युग भी है) में बनाया गया।

  • जीवन के अनुकूल बनाना: कुरान यह स्पष्ट करता है कि धरती को इस तरह से डिजाइन और तैयार किया गया है कि यह तमाम इंसानों, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के रहने के लिए एक सुरक्षित और स्थिर आवास बन सके।

2. धरती का आकार और उसकी बनावट

प्राचीन काल में इंसानों के मन में धरती के आकार को लेकर कई तरह की कल्पनाएं थीं, लेकिन कुरान में इस्तेमाल किए गए अरबी शब्दों की व्याख्या आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ दिलचस्प समानताएं रखती है:

  • फैलाव और अंडाकार रूप: सूरह अन्-नाज़ियात (आयत 30) में ज़मीन की पैदाइश के बाद एक शब्द का प्रयोग हुआ है— "दहाहा (دَحَاهَا)"। अरबी भाषा के जानकारों के मुताबिक, इस शब्द का एक अर्थ 'फैलाना' है और दूसरा संबंध शुतुरमुर्ग के अंडे के आकार से है। चूँकि शुतुरमुर्ग का अंडा पूरी तरह गोल न होकर नारंगी या भू-आभिक (Oblate Spheroid) यानी ध्रुवों पर थोड़ा चपटा होता है, इसलिए कई विद्वान इसे धरती के वास्तविक भौगोलिक स्वरूप से जोड़कर देखते हैं।

  • रात और दिन का लपेटना: सूरह अज़-ज़ुमर (आयत 5) में कहा गया है कि अल्लाह रात को दिन पर और दिन को रात पर लपेटता है (अरबी: युकाविरु)। भाषाविज्ञान के जानकारों का मानना है कि 'लपेटने' या गोल घुमाने की यह प्रक्रिया तभी संभव है जब धरती की बनावट गोलाकार हो, क्योंकि सपाट सतह पर दिन और रात को एक-दूसरे पर लपेटा नहीं जा सकता।

3. पहाड़ों की भूमिका और स्थिरता

कुरान में धरती को संतुलित रखने में पहाड़ों की एक खास भूमिका बताई गई है।

  • मेवे या खूंटे के रूप में पहाड़: सूरह अन्-नबा और सूरह लुक्मान जैसी आयतों में पहाड़ों को धरती की "मेखें" या "खूंटे" कहा गया है।

  • आधुनिक भूविज्ञान (Geology) इस बात की पुष्टि करता है कि पर्वत श्रृंखलाएं विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) को संतुलित रखने और धरती को अत्यधिक कंपन या असंतुलन से बचाने में मदद करती हैं। कुरान इन संरचनाओं को इंसानों के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में चित्रित करता है ताकि धरती पर जीवन सुचारू रूप से चल सके।

मुख्य विचार: कुरान में धरती को इंसानों के लिए एक 'बिछौना' या 'पालना' बताया गया है, जिसका अर्थ है कि इसे बेहद करीने से जीवन की आवश्यकताओं के अनुकूल स्थिर और उपयोगी बनाया गया है।

(इस लेख के अगले भाग में हम पढ़ेंगे कि कुरान धरती पर मौजूद जल स्रोतों, वायुमंडल और पारिस्थितिकी संतुलन के बारे में क्या कहता है।)

क्या आप इस लेख के दूसरे भाग को पढ़ना चाहेंगे जिसमें जल चक्र और प्राकृतिक संसाधनों का विवरण है?