प्रस्तावना: पवित्र कुरान का अवतरण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ कुरान (Al-Qur'an) के अवतरण का इतिहास सातवीं शताब्दी की शुरुआत से जुड़ा हुआ है। इस्लामिक मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, कुरान का अवतरण (वही का आना) सन 610 ईस्वी में शुरू हुआ था। यह वह दौर था जब अरब प्रायद्वीप में आध्यात्मिक और सामाजिक बदलावों की एक नई लहर की शुरुआत हो रही थी।

गार-ए-हिरा और पहली वही

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, जब पैगंबर मुहम्मद की आयु लगभग चालीस वर्ष की थी, तब वे अक्सर मक्का के पास स्थित जबल अनूर (नूर पर्वत) पर स्थित गार-ए-हिरा (हिरा की गुफा) में एकांत, ध्यान और चिंतन के लिए जाया करते थे। सन 610 ईस्वी में रमजान के महीने की एक खास रात (जिसे शब-ए-कद्र भी कहा जाता है) को देवदूत जिब्रईल (गेब्रियल) पैगंबर मुहम्मद के पास ईश्वर का संदेश लेकर आए।

यह कुरान का वह ऐतिहासिक क्षण था जब पहली बार सूरह अल-अलक (Surah Al-Alaq) की शुरुआती आयतें (श्लोक) पैगंबर पर उतारी गईं:

"अपने रब के नाम से पढ़ो, जिसने पैदा किया। जमे हुए खून से मनुष्य को बनाया। पढ़ो, और तुम्हारा रब बड़ा كريم (दयालु) है, जिसने कलम के द्वारा ज्ञान सिखाया। इंसान को वह सिखाया जो वह नहीं जानता था।"

लगभग 23 वर्षों का कालक्रम

कुरान एक ही बार में पूरी किताब के रूप में नहीं उतरी थी, बल्कि यह इंसानी जरूरतों, परिस्थितियों और तत्कालीन सामाजिक घटनाओं के अनुसार लगभग 23 वर्षों (610 ईस्वी से 632 ईस्वी तक) के अंतराल में थोड़े-थोड़े हिस्से के रूप में अवतरित होती रही। इन 23 वर्षों के सफर को दो प्रमुख कालों में बांटा जाता है:

  1. मक्की काल (लगभग 13 वर्ष): मक्का में उतरी हुई आयतें, जिनमें मुख्य रूप से एकेश्वरवाद (तौहीद), परलोक (आखिरत) और नैतिक मूल्यों पर जोर दिया गया।

  2. मदनी काल (लगभग 10 वर्ष): सन 622 ईस्वी में मक्का से मदीना प्रवास (हिजरत) के बाद उतरी हुई आयतें, जिनमें सामाजिक नियम, कानून, और इस्लामिक समाज के गठन से जुड़े निर्देश शामिल थे।

इस प्रकार, सन 632 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद के महाप्रयाण (वफात) के समय तक कुरान के अवतरण का यह सिलसिला पूरा हो चुका था।

क्या आप इस लेख के अगले भाग में यह जानना चाहेंगे कि इन बिखरे हुए संदेशों और आयतों को एक ग्रंथ या पुस्तक के रूप में कैसे संकलित किया गया?