हमारी यह विशाल धरती रहस्यों, विस्मयकारी परंपराओं और अनोखी जगहों से भरी पड़ी है। दुनिया के हर कोने में कुछ न कुछ ऐसा जरूर मौजूद है, जो आम इंसान को अचंभित कर दे। जब भी हम दुनिया के नक्शे को देखते हैं, तो हमारे मन में कई तरह के सवाल उठते हैं। ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला सवाल अक्सर इंटरनेट और आम बातचीत में पूछा जाता है— "क्या दुनिया में कोई ऐसा देश या जगह है जहां मर्द नहीं हैं?"

इस लेख के पहले भाग में हम इसी सवाल की तह तक जाएंगे और जानेंगे कि इस तरह की अवधारणाओं के पीछे की सच्चाई क्या है, क्या वाकई कोई ऐसा देश है या यह केवल एक सामाजिक मिथक (Myth) और मीडिया की सुर्खियां मात्र है।

जनसांख्यिकी और मिथक: क्या सच में कोई पुरुष-विहीन देश है?

वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो धरती पर आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई भी स्वतंत्र देश मौजूद नहीं है जहाँ एक भी पुरुष या मर्द न रहता हो। इंसानी प्रजाति के जैविक अस्तित्व, निरंतरता और प्रजनन चक्र के लिए दोनों (स्त्री और पुरुष) की आवश्यकता होती है। इसलिए, किसी भी संप्रभु देश (Sovereign Country) में केवल एक लिंग का पाया जाना जैविक रूप से असंभव है।

हालांकि, इस तरह के सवालों के जन्म लेने के पीछे कुछ खास जगहों की अनूठी जनसांख्यिकी (Demographics), सामाजिक संरचनाएं और ऐतिहासिक कारण जुड़े हुए हैं। जब लोग "पुरुषों के न होने" की बात करते हैं, तो उनका इशारा अक्सर दुनिया के कुछ ऐसे गांवों, बस्तियों या विशेष क्षेत्रों की तरफ होता है जहां महिलाओं का वर्चस्व अत्यधिक है या पुरुषों की संख्या या तो न के बराबर है या वे वहां स्थायी रूप से नहीं रहते।

ब्राजील का प्रसिद्ध 'नोइवा दो कोरडेएरो' गांव (Noiva do Cordeiro)

जब भी महिलाओं की प्रधान the या पुरुषों की अनुपस्थिति वाली जगहों की बात आती है, तो ब्राजील के नोइवा दो कोरडेएरो (Noiva do Cordeiro) गांव का नाम सबसे पहले लिया जाता है। दक्षिणपूर्वी ब्राजील के पहाड़ों में स्थित यह गांव इन दिनों पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

  • गांव की बनावट: इस खूबसूरत और एकांत गांव में लगभग 600 से अधिक महिलाएं निवास करती हैं।

  • नियम और समाज: इस समाज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां की व्यवस्था पूरी तरह से महिलाओं द्वारा चलाई जाती है। खेती-बारी से लेकर प्रशासनिक और आर्थिक फैसले तक, सब कुछ महिलाएं ही संभालती हैं।

  • पुरुषों की स्थिति: हालांकि यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि यहां एक भी पुरुष नहीं है, लेकिन यहां रहने वाले विवाहित पुरुषों या युवा लड़कों को काम के सिलसिले में हफ्ते के ज्यादातर दिन गांव से बाहर रहना पड़ता है। केवल सप्ताह के अंत में (Weekend) वे अपने घर लौटते हैं। वहीं, कुंवारे पुरुषों के लिए इस गांव में रहने के कड़े सामाजिक नियम हैं।

लातविया और पूर्वी यूरोप का लिंग अनुपात (Gender Ratio)

कई बार लोग सोशल मीडिया पर फैले भ्रम के आधार पर यूरोप के कुछ देशों, विशेषकर लातविया (Latvia) या लिथुआनिया के बारे में यह मान लेते हैं कि वहां मर्द नहीं हैं।

  • वास्तविकता: वास्तविकता यह है कि इन देशों में पुरुष हैं, लेकिन महिलाओं की तुलना में उनकी कुल संख्या (Population Ratio) कम है।

  • ऐतिहासिक कारण: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद के दौर में जनसांख्यिकीय बदलावों तथा स्वास्थ्य कारणों से पुरुषों की जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) महिलाओं के मुकाबले कम दर्ज की गई, जिसके कारण आज भी वहां बुजुर्ग वर्ग में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है।

निष्कर्ष (पहला भाग)

संक्षेप में कहें तो, शाब्दिक अर्थों में ऐसा कोई देश मौजूद नहीं है जहाँ पुरुषों का अस्तित्व ही न हो। लेकिन कुछ खास बस्तियों और गांवों में महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

इस लेख के अगले भाग में हम जानेंगे कि दुनिया के ऐसे कौन-से हिस्से हैं जहाँ महिलाओं ने पूरी तरह से अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की है और वे बिना पुरुषों के सहयोग के अपना जीवन कैसे व्यतीत कर रही हैं।

क्या आप इस विषय के दूसरे भाग में उन विशिष्ट समुदायों और उनकी जीवनशैली के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?

महिलाओं की आत्मनिर्भरता और उमोझा गांव की सच्चाई

इस लेख के दूसरे और अंतिम भाग में हम यह जानेंगे कि कैसे केन्या का उमोझा गांव (Umoja Village) बिना पुरुषों के अस्तित्व में आया और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बना। दुनिया में कोई ऐसा स्वतंत्र देश तो नहीं है जहां पूरी तरह पुरुषों का अस्तित्व न हो, लेकिन कुछ खास बस्तियां और गांव ऐसे जरूर हैं जो महिलाओं द्वारा संचालित होते हैं।

उमोझा गांव की स्थापना और संघर्ष

  • शुरुआत (1990): इस अनूठी जगह की स्थापना रेबेका लोलोसोली ने की थी, जिन्होंने स्थानीय रूढ़िवादी परंपराओं और अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई थी।

  • सुरक्षित ठिकाना: यह गांव उन महिलाओं के लिए शरणस्थली बना जो घरेलू हिंसा, बाल विवाह, और जबरन कुप्रथाओं का शिकार थीं।

  • नियम: इस गांव के अंदर पुरुषों के रहने पर पूरी तरह प्रतिबंध है, हालांकि बाहरी पर्यटक के रूप में वे नियमों का पालन करके आ सकते हैं।

आजीविका और समाज का नया मॉडल

यहाँ रहने वाली महिलाएं अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं:

  • हस्तशिल्प और कला: महिलाएं पारंपरिक रंग-बिरंगे गहने और मोतियों की माला बनाकर पर्यटकों को बेचती हैं।

  • पर्यटन: गांव के पास बनाए गए कैंपसाइट और सांस्कृतिक केंद्रों से होने वाली आय से महिलाओं का भरण-पोषण होता है।

  • शिक्षा और अधिकार: बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल चलाए जाते हैं और आसपास के इलाकों में महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाई जाती है।

निष्कर्ष: हालांकि यह कोई संप्रभु देश नहीं, बल्कि केन्या का एक छोटा सा गांव है, लेकिन यह इस बात का बड़ा उदाहरण है कि महिलाएं बिना पुरुष आधिपत्य के भी एक सशक्त, शांतिपूर्ण और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण कर सकती हैं।

क्या आप दुनिया की ऐसी अन्य महिला-प्रधान समुदायों या संस्कृतियों के बारे में जानना चाहते हैं?