कोहिनूर हीरा का इतिहास: एक परिचय
दुनिया के सबसे बेशकीमती, रहस्यमयी और चर्चित हीरों में शुमार कोहिनूर हीरा (Koh-i-Noor Diamond) हमेशा से ही इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है।
गोलकुंडा की खदानें और पहला राजवंश
इतिहासकारों के अनुसार, कोहिनूर हीरा भारत की प्राचीन गोलकुंडा की खदानों (विशेषकर आंध्र प्रदेश के वर्तमान गुंटूर जिले में स्थित कोल्लर खदान) से निकला था।
काकतीय राजवंश (Kakatiya Dynasty):
पुख्ता ऐतिहासिक और प्रामाणिक साक्ष्यों के आधार पर कोहिनूर हीरे का सबसे पहला ज्ञात मालिक काकतीय राजवंश को माना जाता है। मंदिर की शोभा:
दक्षिण भारत पर शासन करने वाले काकतीय राजाओं ने इस दैदीप्यमान हीरे को अपनी कुलदेवी मां भद्रकाली के मंदिर में स्थापित किया था। लोक कथाओं और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस बेशकीमती हीरे को देवी की प्रतिमा की बाईं आंख के रूप में जड़ा गया था, ताकि मंदिर और राज्य पर हमेशा देवी की कृपा बनी रहे।
राजवंशों के बदलाव और लूट का दौर
काकतीय वंश के पास ज्यादा समय तक यह हीरा सुरक्षित नहीं रह सका।
खिलजी वंश का आक्रमण: दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने वारंगल पर आक्रमण किया।
इस सैन्य अभियान के दौरान काकतीय राजाओं को पराजय का सामना करना पड़ा। पहला परिवर्तन:
इसी युद्ध और लूटपाट के दौरान यह प्रसिद्ध हीरा काकतीय राजवंश के हाथ से निकलकर दिल्ली सल्तनत यानी अलाउद्दीन खिलजी के कब्जे में चला गया। यही वह मोड़ था जिसके बाद से कोहिनूर का सफर 'खरीद-फरोख्त' का नहीं, बल्कि विजय, हार, धोखे और छीना-झपट का बन गया।
खिलजी वंश के बाद यह हीरा दिल्ली के अलग-अलग शासकों (तुगलक और लोधी वंश) से होता हुआ अंततः मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के हाथों में पहुंचा, जिसका जिक्र स्वयं बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में भी किया है।
मुख्य बिंदु: कोहिनूर हीरे का प्रारंभिक इतिहास हमें यह बताता है कि यह भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का एक अभिन्न हिस्सा था, जिसे बलपूर्वक इसके मूल संरक्षकों यानी काकतीय राजाओं से छीन लिया गया था।
क्या आप जानना चाहते हैं कि मुगलों के बाद यह हीरा किस प्रकार नादिर शाह और महाराजा रणजीत सिंह के हाथों से होता हुआ अंततः अंग्रेजों के पास पहुंचा?
कोहिनूर: मुगलों से ब्रिटिश राज तक का सफर
मुग़ल साम्राज्य और फारसी आक्रमण
काकतीय राजवंश के पतन के बाद यह बेशकीमती हीरा दिल्ली सल्तनत के विभिन्न शासकों से होता हुआ 16वीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के पास पहुँचा। बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में इस रत्न का विशेष रूप से उल्लेख किया था। इसके बाद यह लंबी समयावधि तक मुग़लों के मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताऊस) की शान बना रहा। सन 1739 में जब ईरानी शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया, तो वह मयूर सिंहासन के साथ-साथ इस नायाब हीरे को भी लूटकर अपने साथ फारस (वर्तमान ईरान) ले गया।
महाराजा रणजीत सिंह और पंजाब का अधिकार
नादिर शाह की मृत्यु के बाद यह हीरा कई उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए अफगान शासक शाह शुजा दुर्रानी के हाथ लगा।
ब्रिटिश क्राउन और वर्तमान स्थिति
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य कमजोर हो गया और अंग्रेजों ने दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के बाद पंजाब पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित कर लिया। वर्ष 1849 में हुई 'लाहौर की संधि' के तहत कम उम्र महाराजा दलीप सिंह से यह ऐतिहासिक हीरा अंग्रेजों को सौंपने के लिए विवश किया गया। इसके बाद साल 1850 में इसे तत्कालीन ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के पास लंदन भेज दिया गया।
तथ्य: आज यह हीरा लंदन के टॉवर में ब्रिटिश शाही परिवार के ताज (Crown Jewels) में जड़ा हुआ है। हालांकि, भारत समेत कई देश इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को वापस पाने के लिए लगातार अपनी मांग उठाते रहे हैं।
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