राजस्थान को प्राचीन काल में 'राजपूताना', 'रजवाड़ा', और 'रायथान' जैसे प्रमुख नामों से जाना जाता था। वैदिक काल में इस संपूर्ण भू-भाग के लिए 'ब्रह्मवर्त' तथा मरुस्थलीय क्षेत्र के लिए 'मरुकंतार' शब्द का प्रयोग होता था।
नामकरण का ऐतिहासिक विकासक्रम
राजस्थान का नामकरण किसी एक घटना का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का परिणाम है।
1. प्राचीन ग्रंथ एवं शिलालेख
वैदिक काल: ऋग्वेद में राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी शुष्क भू-भाग को 'धन्व' या 'मरु' कहा गया है। संपूर्ण क्षेत्र के लिए 'ब्रह्मवर्त' शब्द का संदर्भ मिलता है।
रामायण काल: महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में इस क्षेत्र को 'मरुकंतार' नाम से संबोधित किया था।
वसंतगढ़ शिलालेख (625 ई.सम्पादित): सिरोही जिले के वसंतगढ़ शिलालेख में 'राजस्थानियादित्य' शब्द का प्रयोग मिलता है, जिसे राजस्थान नाम का सबसे प्राचीन लिखित प्रमाण माना जाता है।
2. मध्यकालीन संदर्भ
मुहणौत नैणसी री ख्यात: 17वीं शताब्दी में जोधपुर के प्रसिद्ध इतिहासकार मुहणौत नैणसी ने अपनी कृति में 'राजस्थान' शब्द का उल्लेख किया।
राजरूपक: वीरभाण द्वारा रचित 'राजरूपक' ग्रंथ में भी 'राजस्थान' शब्द का प्रयोग इस क्षेत्र के लिए हुआ है।
प्रमुख ऐतिहासिक नाम और उनके स्रोत
ब्रिटिश काल में नामकरण
जॉर्ज थॉमस और 'राजपूताना' वर्ष 1800 ई. में आयरिश सैन्य अधिकारी जॉर्ज थॉमस ने इस भू-भाग के लिए पहली बार 'राजपूताना' (Rajputana) शब्द का मौखिक प्रयोग किया था। इसका लिखित प्रमाण 1805 ई. में विलियम फ्रेंकलिन की पुस्तक "मिलिट्री मेमोयर्स ऑफ मिस्टर जॉर्ज थॉमस" में मिलता है। उस समय इस क्षेत्र में अधिकांश रियासतों पर राजपूत शासकों का शासन था, जिस कारण अंग्रेजों ने इसे राजपूताना नाम दिया।
कर्नल जेम्स टॉड और 'रायथान' पश्चिम भारत के इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (जिन्हें 'घोड़े वाले बाबा' भी कहा जाता है) ने 1829 ई. में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Annals and Antiquities of Rajasthan" में इस क्षेत्र के लिए तीन शब्दों का प्रयोग किया:
रायथान (स्थानिक बोली में राजाओं का आवास)
रजवाड़ा (रियासतों का क्षेत्र)
राजस्थान (राजाओं का स्थान)
एकीकरण और आधुनिक नाम 'राजस्थान'
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के समय यहाँ 19 देशी रियासतें, 3 ठिकाने (कुशलगढ़, लावा, नीमराना) और 1 केंद्र शासित प्रदेश (अजमेर-मेरवाड़ा) थे।
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