भारत में फुटबॉल का खेल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक ऐसा जनून है जो देश के कोने-कोने में, विशेषकर पश्चिम बंगाल, केरल, गोवा और पूर्वोत्तर के राज्यों में लोगों की सांसों में बसता है। क्रिकेट को भले ही भारत में एक धर्म की तरह पूजा जाता हो, लेकिन फुटबॉल के दीवानों के लिए इस खेल का अपना एक अलग और अनूठा इतिहास है। जब भी बात भारतीय फुटबॉल के इतिहास और उसके महानतम नायकों की होती है, तो एक सवाल हर फुटबॉल प्रेमी के जेहन में सबसे पहले आता है: "भारत में फुटबॉल का भगवान किसे कहा जाता है?"
इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए हमें भारतीय फुटबॉल के उस स्वर्णिम काल में गोता लगाना होगा जिसे 'स्वर्ण युग' (Golden Era) कहा जाता है - 1950 और 1960 का दशक। उस दौर में भारतीय फुटबॉल टीम एशिया की सबसे खूंखार और ताकतवर टीमों में गिनी जाती थी। इस सुनहरे इतिहास की नींव रखने वाले और इसे दुनिया भर में पहचान दिलाने वाले महानायक का नाम है - सैयद अब्दुल रहीम, जिन्हें प्यार से लोग 'रहीम साहब' कहते हैं, और मैदान पर जादू बिखेरने वाले खिलाड़ियों में चुन्नी गोस्वामी, पी. के. बनर्जी और तुलसीदास बलराम जैसे दिग्गज शामिल हैं।
आइए इस लेख के इस पहले हिस्से में विस्तार से जानते हैं कि भारतीय फुटबॉल का असली 'भगवान' या वह महानतम मसीहा कौन है जिसने इस खेल को भारत में एक नई पहचान दी।
1. भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम युग और सैयद अब्दुल रहीम की भूमिका
जब हम फुटबॉल के 'भगवान' या सर्वोच्च प्रेरणास्रोत की बात करते हैं, तो खिलाड़ियों के साथ-साथ एक ऐसे कोच का नाम सबसे ऊपर आता है जिन्होंने अकेले दम पर भारतीय फुटबॉल की किस्मत बदल दी थी। उनका नाम था सैयद अब्दुल रहीम (Syed Abdul Rahim)।
1950 से 1963 के बीच भारतीय फुटबॉल टीम के मुख्य कोच और प्रबंधक के रूप में रहीम साहब का कार्यकाल भारतीय खेल इतिहास का सबसे गौरवशाली अध्याय माना जाता है। उनके नेतृत्व में भारत ने वह मुकाम हासिल किया जिसकी कल्पना आज के समय में करना भी मुश्किल लगता है:
1956 मेलबर्न ओलंपिक (Melbourne Olympics): रहीम साहब के मार्गदर्शन में भारतीय टीम ने मेलबर्न ओलंपिक के सेमीफाइनल में प्रवेश किया। यह इतिहास में पहली बार था कि किसी एशियाई फुटबॉल टीम ने ओलंपिक के सेमीफाइनल में जगह बनाई हो। भारत ने इस टूर्नामेंट में चौथा स्थान हासिल किया था, जो आज भी एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है।
1962 जकार्ता एशियाई खेल (Asian Games): यह भारतीय फुटबॉल का सबसे बड़ा गौरवशाली क्षण था। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में खेले गए एशियाई खेलों में मेजबान देश के भारी-भरकम दर्शकों और भारी दबाव के बावजूद, भारतीय टीम ने फाइनल में दक्षिण कोरिया को 2-1 से हराकर स्वर्ण पदक (Gold Medal) जीता था।
रहीम साहब सिर्फ एक कोच नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी रणनीतिकार और पिता तुल्य मार्गदर्शक थे। उन्होंने भारत में '4-2-4' फॉर्मेशन और आक्रामक पासिंग गेम की नींव रखी, जिसकी तारीफ उस समय यूरोपीय देश भी करते थे। यही कारण है कि फुटबॉल के जानकारों और पुराने खिलाड़ियों के बीच सैयद अब्दुल रहीम को ही भारतीय फुटबॉल का असली 'भगवान' या संस्थापक माना जाता है।
2. मैदान के जादूगर: खिलाड़ियों में किसे माना जाता है भगवान?
कोच के अलावा, यदि हम सीधे मैदान पर उतरकर देश के लिए जादू बिखेरने वाले खिलाड़ियों की बात करें, तो भारतीय फुटबॉल इतिहास में कुछ ऐसे नाम दर्ज हैं जिन्हें उनके खेल कौशल के कारण भगवान जैसी दर्जा दिया गया।
चुन्नी गोस्वामी (Chuni Goswami)
सुबिमल गोस्वामी, जिन्हें पूरी दुनिया 'चुन्नी गोस्वामी' के नाम से जानती है, भारतीय फुटबॉल के सबसे चमकीले सितारों में से एक थे। वे एक शानदार फॉरवर्ड और कप्तान थे जिनके नेतृत्व में भारत ने 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। चुन्नी गोस्वामी की ड्रिबलिंग स्किल और मैदान पर उनकी समझ इतनी गजब की थी कि विरोधी टीमें भी उनकी कायल थीं। दिलचस्प बात यह है कि फुटबॉल छोड़ने के बाद उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में बंगाल की कप्तानी भी की और रणजी ट्रॉफी के फाइनल तक पहुंचे। लेकिन उनकी पहचान हमेशा एक महान फुटबॉलर के रूप में ही रही।
पी. के. बनर्जी (Pradip Kumar Banerjee)
पी. के. बनर्जी को भारतीय फुटबॉल का 'पेले' या महानतम गोल स्कोरर माना जाता है। 1960 के रोम ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ उनका वह जादुई गोल आज भी भारतीय फुटबॉल इतिहास के सबसे खूबसूरत पलों में गिना जाता है। बनर्जी ने न सिर्फ भारत के लिए ढेरों मैच जिताए, बल्कि अपनी शानदार लीडरशिप से टीम को एक नई ऊंचाई दी। उन्हें फीफा (FIFA) द्वारा 'ऑर्डर ऑफ मेरिट' से भी सम्मानित किया गया था, जो किसी भी भारतीय फुटबॉलर के लिए बहुत बड़ा सम्मान है।
3. आधुनिक युग और बाइचुंग भूटिया से लेकर सुनील छेत्री तक का सफर
जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, भारतीय फुटबॉल ने कई उतार-चढ़ाव देखे। लेकिन 90 के दशक के आखिरी सालों और 2000 के दशक की शुरुआत में एक ऐसा नाम उभरा जिसने एक बार फिर देश में फुटबॉल के प्रति क्रेज को जिंदा कर दिया - बाइचुंग भूटिया (Bhaichung Bhutia)।
सिक्किम से आने वाले बाइचुंग भूटिया को आधुनिक भारतीय फुटबॉल का पोस्टर बॉय कहा गया। वे भारत के पहले ऐसे फुटबॉलर बने जिन्होंने यूरोप के पेशेवर क्लब (इंग्लैंड के बेरी एफसी) के लिए फुटबॉल खेला। उनकी शानदार स्पीड, हवा में हेडर लगाने की गजब की क्षमता और मैदान पर आक्रामक रवैये ने उन्हें भारत का नया 'आइकन' बना दिया। एक समय ऐसा आया जब लाखों युवा बाइचुंग भूटिया को ही अपना भगवान मानकर फुटबॉल के मैदान में उतरे।
बाइचुंग भूटिया के बाद यह मशाल थामी सुनील छेत्री (Sunil Chhetri) ने। सुनील छेत्री ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में गोल करने के मामले में दुनिया के महान खिलाड़ियों (जैसे क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी) की सूची में अपनी जगह बनाई। दशकों तक देश के लिए पसीना बहाने वाले सुनील छेत्री को आज की पीढ़ी 'भारतीय फुटबॉल का भगवान' ही मानती है, क्योंकि उन्होंने मुश्किल दौर में अकेले दम पर भारतीय टीम को संभाला और कई ऐतिहासिक जीत दिलाईं।
निष्कर्ष (पहلا भाग)
संक्षेप में कहें तो, "भारत में फुटबॉल का भगवान कौन है?" इस एक सवाल का कोई एक जवाब नहीं है। यह समय और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है:
रणनीति और स्वर्णिम युग के लिहाज से: सैयद अब्दुल रहीम इसके असली हकदार हैं।
मैदानी जादू और ऐतिहासिक सफलताओं के लिहाज से: चुन्नी गोस्वामी और पी. के. बनर्जी का नाम सबसे ऊपर आता है।
आधुनिक और समकालीन दौर के लिहाज से: बाइचुंग भूटिया और सुनील छेत्री ने इस भूमिका को बखूबी निभाया है।
भारतीय फुटबॉल का इतिहास बलिदान, संघर्ष और असाधारण प्रतिभाओं की कहानियों से भरा पड़ा है, और इन सभी महानायकों ने मिलकर इस खेल को भारत में एक अमर पहचान दी है।
सुनील छेत्री: आधुनिक भारतीय फुटबॉल के असली मसीहा
जब भी भारत में आधुनिक फुटबॉल के सबसे महान खिलाड़ी और 'भगवान' जैसे दर्जे की बात होती है, तो जेहन में सबसे पहला नाम सुनील छेत्री का आता है।
स्वर्णिम विरासत और अन्य दिग्गज
सुनील छेत्री से पहले भी भारतीय फुटबॉल को कई ऐसे अनमोल रत्न मिले जिन्होंने इसे सींचा है:
चुन्नी गोस्वामी और पी.के. बनर्जी: भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम युग (1950-60 के दशक) के ये वे सितारे थे, जिन्होंने एशियाई स्तर पर भारत का डंका बजाया था।
आई.एम. विजयन:
अपनी जादुई ड्रिबलिंग और कौशल के कारण उन्हें भारतीय फुटबॉल का 'पेले' या कलाकर माना जाता था। विजयन के खेल कौशल से प्रेरित होकर ही अगली पीढ़ी ने इस खेल को अपनाया। बाइचुंग भूटिया:
यूरोपियन लीग में खेलने वाले और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले भूटिया को साथी खिलाड़ियों ने खुद "भगवान का वरदान" कहा है। भूटिया ने ही देश में सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ियों के लिए सफलता का मार्ग प्रशस्त किया था।
निष्कर्ष: एक जनून जो कभी थमेगा नहीं
भले ही वैश्विक स्तर पर लोग पेले, माराडोना, मेसी या रोनाल्डो को फुटबॉल का भगवान मानते हों, लेकिन भारत की मिट्टी में फुटबॉल की अलख जगाने का श्रेय हमारे इन घरेलू नायकों को जाता है। सुनील छेत्री का यह सफर सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि आप अपने देश के लिए पूरी ईमानदारी से मैदान पर उतरते हैं, तो करोड़ों दिलों में अमर होना तय है। भारतीय फुटबॉल आज भले ही वैश्विक प्रतियोगिताओं में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा हो, लेकिन इन महान खिलाड़ियों का योगदान हमेशा अमर रहेगा।
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