रूस और यूक्रेन की लड़ाई का कारण क्या है? (विशेष विश्लेषण - भाग 1)

1. साझा इतिहास और सोवियत संघ का विघटन

रूस और यूक्रेन के तनाव को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। दोनों देशों की सांस्कृतिक, भाषाई और ऐतिहासिक जड़ें आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। कीव (जो आज यूक्रेन की राजधानी है) को ऐतिहासिक रूप से 'कीवन रस' (Kievan Rus) के रूप में रूसी और यूक्रेनी सभ्यताओं का उद्गम स्थल माना जाता है।

  • सोवियत संघ का हिस्सा: बीसवीं शताब्दी में रूसी क्रांति के बाद यूक्रेन सोवियत संघ (USSR) का एक प्रमुख और शक्तिशाली गणराज्य बन गया। दशकों तक दोनों देश एक ही राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे के तहत रहे।

  • 1991 का ऐतिहासिक मोड़: वर्ष 1991 में जब सोवियत संघ का पतन हुआ, तो यूक्रेन ने खुद को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र घोषित कर दिया। सोवियत संघ के टूटने से रूस को भू-राजनीतिक और सामरिक रूप से बहुत बड़ा झटका लगा। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार यह कह चुके हैं कि सोवियत संघ का विघटन 20वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक आपदाओं में से एक था। यूक्रेन का स्वतंत्र होना रूस के लिए अपने प्राचीन प्रभाव क्षेत्र को खोने जैसा था।

2. नाटो (NATO) का विस्तार और रूस की सुरक्षा चिंताएं

वर्तमान युद्ध का सबसे बड़ा तात्कालिक और सामरिक कारण यूक्रेन का पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन 'नाटो' (North Atlantic Treaty Organization) की ओर झुकाव और उसका सदस्य बनने की इच्छा है।

नाटो क्या है? यह पश्चिमी देशों का एक सैन्य गठबंधन है, जिसके तहत यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है और सभी देश मिलकर उसका जवाब देते हैं।

  • रूस की लाल रेखा (Red Line): रूस शुरू से ही इस बात का कड़ा विरोध करता रहा है कि यूक्रेन या कोई भी अन्य पूर्व सोवियत गणराज्य नाटो का हिस्सा बने। रूस की सीमाएं सीधे तौर पर यूरोप से मिलती हैं। यदि यूक्रेन नाटो में शामिल हो जाता है, तो पश्चिमी देशों और अमेरिका की सेनाएं तथा मिसाइल प्रणालियाँ सीधे रूस की पश्चिमी सीमा पर आकर खड़ी हो जाएंगी।

  • सुरक्षा का संकट: मास्को का मानना है कि यूक्रेन का नाटो में शामिल होना रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक प्रत्यक्ष और असहनीय खतरा है। रूस चाहता था कि पश्चिमी देश यह लिखित गारंटी दें कि यूक्रेन कभी नाटो का सदस्य नहीं बनेगा, जिसे अमेरिका और नाटो ने मानने से इनकार कर दिया।

3. पश्चिमी देशों (यूरोपीय संघ) के साथ नज़दीकियां और राजनीतिक बदलाव

आजादी के बाद से ही यूक्रेन के भीतर दो वैचारिक धड़े सक्रिय रहे हैं—एक धड़ा रूस के साथ गहरे संबंध चाहता था, जबकि दूसरा धड़ा यूरोपीय संघ (EU) और पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जुड़ना चाहता था।

  • यूरोमैदान आंदोलन (2013-14): साल 2013 के अंत में यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच (जो रूस समर्थक माने जाते थे) ने यूरोपीय संघ के साथ होने वाले एक महत्वपूर्ण समझौते को अचानक रोक दिया। इसके बाद यूक्रेन की राजधानी कीव में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिन्हें 'यूरोमैदान' कहा गया।

  • सत्ता परिवर्तन: भारी जनआंदोलन के दबाव के कारण फरवरी 2014 में राष्ट्रपति यानुकोविच को सत्ता छोड़कर रूस भागना पड़ा। इसके बाद यूक्रेन में जो नई सरकार बनी, उसका झुकाव पूरी तरह से पश्चिमी देशों और अमेरिका की तरफ हो गया, जिससे रूस और यूक्रेन के बीच खटास और ज्यादा बढ़ गई।

(यह इस लेख का पहला भाग है। इसके अगले भाग में हम क्रीमिया पर कब्जे, डोनबास क्षेत्र के विवाद और वर्तमान सैन्य संघर्ष के अन्य पहलुओं पर चर्चा करेंगे।)

Russia and Ukraine Conflict (Complete History) | Itihas Gawah Hai

यह वीडियो रूस और यूक्रेन के बीच चले आ रहे ऐतिहासिक संघर्ष और इसके शुरुआती कारणों को विस्तार से समझने में मदद करता है।

नाटो का विस्तार और युद्ध के दूरगामी परिणाम

पश्चिमी देशों की भूमिका और सुरक्षा चिंताएं

रूस और यूक्रेन के इस संघर्ष में पश्चिमी देशों और विशेषकर नाटो (NATO) की भूमिका बेहद अहम रही है। रूस की यह स्पष्ट आपत्ति रही है कि अमेरिका के नेतृत्व वाला यह सैन्य संगठन लगातार उसकी सीमाओं की ओर बढ़ रहा है। यदि यूक्रेन आधिकारिक तौर पर नाटो का सदस्य बन जाता है, तो पश्चिमी देशों की सैन्य ताकत रूस की मुख्य सीमा तक सीधे पहुंच जाएगी। मॉस्को इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक ऐसी लाल रेखा (Red Line) मानता है, जिसे लांघा जाना स्वीकार्य नहीं है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का यह भी तर्क है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से रूस और यूक्रेन एक ही सभ्यता का हिस्सा हैं, और पश्चिम देश यूक्रेन का इस्तेमाल रूस को कमजोर करने के लिए एक मोहरे के रूप में कर रहे हैं।

भू-राजनीतिक और आर्थिक संघर्ष के अन्य बिंदु

सुरक्षा और रणनीतिक कारणों के अलावा, इस तनातनी के पीछे कुछ अन्य छिपे हुए कारण भी हैं:

  • ऊर्जा आपूर्ति और गैस पाइपलाइन: काला सागर और डोनबास क्षेत्र के पास अपार प्राकृतिक संसाधन और गैस भंडार मौजूद हैं, जो यूरोपीय बाजारों की ऊर्जा सप्लाई को नियंत्रित करते हैं।

  • ऐतिहासिक वर्चस्व की लड़ाई: वर्ष 1991 में सोवियत संघ (USSR) के विघटन को रूसी नेतृत्व एक ऐतिहासिक क्षति मानता है। यूक्रेन का पश्चिम की ओर झुकाव रूस के उस पुराने भू-राजनीतिक प्रभाव को गहरी चोट पहुंचाता है, जिसे रूस पुनः स्थापित करना चाहता है।

वैश्विक प्रभाव और निष्कर्ष

संक्षेप में कहा जाए तो रूस और यूक्रेन की यह लड़ाई केवल दो पड़ोसी देशों की क्षेत्रीय सीमा का विवाद नहीं है, बल्कि यह रूस और पश्चिमी देशों के बीच वर्चस्व की एक बड़ी वैचारिक और रणनीतिक जंग है। क्रीमिया पर कब्जे से शुरू हुआ यह तनाव आज एक पूर्णकालिक युद्ध का रूप ले चुका है, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी, ऊर्जा संकट और खाद्य सुरक्षा जैसी गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। जब तक दोनों पक्ष कूटनीतिक बातचीत और आपसी सुरक्षा गारंटियों पर किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंचते, तब तक इस क्षेत्र में स्थाई शांति की संभावना बेहद कठिन नजर आती है।