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रूस-यूक्रेन युद्ध: एक गहरी ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का सच
रूस और यूक्रेन के संबंधों की जड़ें बहुत पुरानी और गहरी हैं। दोनों देशों की साझी शुरुआत मध्यकालीन 'कीवन रस' (Kievan Rus) नामक वाइकिंग महासंघ से मानी जाती है। सदियों तक भौगोलिक और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद, आधुनिक यूक्रेन का एक बड़ा हिस्सा रूसी साम्राज्य और बाद में सोवियत संघ (USSR) के अधीन आ गया।
1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही यूक्रेन एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा। सोवियत संघ के पतन को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इतिहास की एक बड़ी भू-राजनीतिक त्रासदी मानते हैं। रूसी नेतृत्व यह मानता रहा है कि सांस्कृतिक, भाषाई और ऐतिहासिक रूप से रूस और यूक्रेन एक ही 'रूसी दुनिया' (Russian World) का हिस्सा हैं। यही कारण है कि रूस के एक बड़े वर्ग और खुद राष्ट्रपति पुतिन के लिए यूक्रेन का पश्चिम की ओर झुकाव केवल एक कूटनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से अपनी ही ज़मीन के टूटने जैसा प्रतीत होता है।
नाटो (NATO) का विस्तार और रूस की मुख्य सुरक्षा चिंताएं
इस युद्ध के पीछे का सबसे तात्कालिक और बड़ा भू-राजनीतिक कारण अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य संगठन नाटो (NATO) का पूर्व की ओर विस्तार है।
सुरक्षा का दायरा: सोवियत संघ के टूटने के बाद पश्चिमी देशों ने यह मौखिक आश्वासन दिया था कि नाटो का विस्तार रूस की सीमाओं की ओर नहीं होगा। लेकिन इसके विपरीत, पूर्वी यूरोप के कई देश धीरे-धीरे नाटो में शामिल होते चले गए।
यूक्रेन की नाटो सदस्यता की लालसा: यूक्रेन ने पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक और सामरिक संबंधों को मजबूत करते हुए औपचारिक रूप से नाटो का सदस्य बनने की इच्छा जताई।
रूस की लाल लाइन: रूस के दृष्टिकोण से, यदि यूक्रेन नाटो का हिस्सा बन जाता है, तो पश्चिमी देशों की सेनाएं और मिसाइल प्रणालियाँ सीधे रूस की मुख्य सीमा तक पहुँच जाएंगी। मास्को के लिए यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक ऐसी 'रेड लाइन' थी, जिसे पार करना अस्वीकार्य था। रूस लगातार यह मांग करता रहा कि यूक्रेन को कभी भी नाटो में शामिल न किया जाए और उसे एक तटस्थ देश (Neutral State) के रूप में रखा जाए।
2014 का मोड़: क्रीमिया संकट और डोनबास की आग
रूस और यूक्रेन के बीच वर्तमान खूनी संघर्ष रातों-रात पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसकी नींव साल 2014 में ही रख दी गई थी।
यूरोमैदान आंदोलन: साल 2013 के अंत में यूक्रेन में बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए, जिन्हें 'यूरोमैदान' कहा जाता है। इन प्रदर्शनों के चलते रूस समर्थक माने जाने वाले तत्कालीन यूक्रेनी राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को सत्ता छोड़कर भागना पड़ा। इसके बाद यूक्रेन की राजनीति में पश्चिमी समर्थक ताकतों का दबदबा बढ़ गया।
क्रीमिया का विलय: इस राजनीतिक बदलाव से बौखलाए रूस ने 2014 में त्वरित सैन्य कार्रवाई करते हुए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्रीमिया प्रायद्वीप पर कब्जा कर लिया और उसका रूस में विलय कर दिया।
डोनबास संघर्ष: क्रीमिया के बाद पूर्वी यूक्रेन के औद्योगिक क्षेत्र 'डोनबास' (डोनेट्स्क और लुगांस्क) में रूस समर्थक अलगाववादियों ने यूक्रेनी सरकार के खिलाफ हथियार उठा लिए। इस गृहयुद्ध जैसी स्थिति में रूस ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अलगाववादियों का समर्थन किया, जिसके चलते दोनों देशों के बीच तनाव स्थायी दुश्मनी में बदल गया।
(यह इस लेख का पहला भाग है। अगले भाग में हम फरवरी 2022 के पूर्ण आक्रमण, पश्चिमी प्रतिबंधों और इस युद्ध के वैश्विक प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।)
रूस-यूक्रेन युद्ध: भू-राजनीतिक परिणाम और वर्तमान स्थिति (दूसरा भाग)
नाटो का विस्तार और सुरक्षा चिंताएं
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस संघर्ष का सबसे बड़ा तात्कालिक कारण यूक्रेन का पश्चिमी सैन्य गठबंधन 'नाटो' (NATO) में शामिल होने की इच्छा रखना है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और रूसी प्रशासन इसे मॉस्को की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक लाल रेखा (Red Line) मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जाता है, तो पश्चिमी देशों और अमेरिका की सेनाएं तथा मिसाइल प्रणालियां सीधे रूस की सीमा तक पहुंच जाएंगी, जिससे रूस की सामरिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। दूसरी ओर, यूक्रेन अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति का हवाला देते हुए पश्चिम के साथ अपने गठबंधनों को चुनने का पूरा अधिकार रखता है।
क्रीमिया संकट और डोनबास संघर्ष
इस तनाव की नींव साल 2014 में ही पड़ गई थी, जब यूक्रेन की जनता के भारी विरोध के बाद वहां की रूस-समर्थक सरकार को सत्ता से हटा दिया गया था। इसके जवाब में रूस ने फौरन कार्रवाई करते हुए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण प्रायद्वीप क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। इसके तुरंत बाद, यूक्रेन के पूर्वी औद्योगिक क्षेत्र यानी डोनबास (डोनेट्स्क और लुगांस्क) में रूस-समर्थक अलगाववादियों और यूक्रेनी सेना के बीच खूनी संघर्ष शुरू हो गया। हालांकि दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित करने के लिए 'मिंस्क समझौते' पर हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन वे इस क्षेत्रीय विवाद को रोकने में नाकामयाब रहे, जिससे आखिरकार फरवरी 2022 में एक पूर्णकालिक सैन्य संघर्ष की शुरुआत हुई।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक प्रभाव
इस युद्ध के परिणाम केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इसने पूरी वैश्विक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है:
ऊर्जा और खाद्य संकट: रूस और यूक्रेन दोनों ही गेंहू, उर्वरक और कच्चे तेल के बड़े निर्यातक हैं। युद्ध के कारण इनकी आपूर्ति बाधित हुई, जिससे दुनियाभर में महंगाई आसमान छूने लगी।
आर्थिक प्रतिबंध: अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिसके चलते वैश्विक स्तर पर वित्तीय बाजार प्रभावित हुए हैं।
कूटनीतिक ध्रुवीकरण: इस संकट ने दुनिया को एक बार फिर वैचारिक और कूटनीतिक मोर्चों पर बांट दिया है, जहां कई देश शांति और कूटनीतिक संवाद (डायलॉग) के जरिए इस भीषण तबाही को रोकने की लगातार अपील कर रहे हैं।
इस संघर्ष को विस्तार से समझने के लिए आप यह रूस-यूक्रेन संघर्ष की पूरी कहानी देख सकते हैं।
Russia vs Ukraine Conflict Explained in Hindi | रूस और यूक्रेन में लड़ाई क्यों हो रही है? Jigyasium · 90K views
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