अंतरराष्ट्रीय पदार्पण और सुनहरे संघर्ष की कहानी

भारतीय महिला क्रिकेट संघ (WCAI) की स्थापना के बाद, टीम ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कदम रखने की दिशा में तेजी से, लेकिन संघर्षपूर्ण शुरुआत की। साल 1975 में ऑस्ट्रेलिया की अंडर-25 महिला टीम ने भारत का दौरा किया, जिससे देश में पहली बार महिला द्विपक्षीय सीरीज का माहौल बना। इसके बाद, 31 अक्टूबर 1976 को बैंगलोर (अब बेंगलुरु) के मैदान पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना ऐतिहासिक पहला टेस्ट मैच खेला। शांतारंगास्वामी के नेतृत्व में खेली गई इस शुरुआती श्रृंखला ने यह साबित कर दिया कि भारतीय महिलाएं भी क्रिकेट के लंबे प्रारूप में टिकने और मुकाबला करने का माद्दा रखती हैं।

अंतरराष्ट्रीय पटल पर आगे बढ़ते हुए, टीम ने 1 जनवरी 1978 को कोलकाता के ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ अपना पहला एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय (ODI) मुकाबला खेला। दिलचस्प बात यह है कि उसी वर्ष (1978) भारत ने महिला क्रिकेट विश्व कप की मेजबानी भी की, जो देश में इस खेल के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता का एक बड़ा प्रमाण था। शुरुआती दौर में संसाधनों की भारी कमी, पर्याप्त वित्तीय मदद का अभाव और सामाजिक बाधाओं के कारण महिला खिलाड़ियों को अनगिनत चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, खिलाड़ियों का जज्बा कभी कम नहीं हुआ।

दसों दशकों के इस संघर्षपूर्ण सफर से गुजरते हुए, साल 2006 में भारतीय महिला क्रिकेट संघ का पूरी तरह से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) में विलय हो गया। इस ऐतिहासिक कदम ने भारतीय महिला क्रिकेट की तस्वीर ही बदल दी। बीसीसीआई के प्रशासनिक और आर्थिक दायरे में आने के बाद खिलाड़ियों को बेहतर बुनियादी ढांचा, आधुनिक ट्रेनिंग सुविधाएं, मैच फीस और अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक्सपोजर मिलने लगा।

मिताली राज और झूलन गोस्वामी जैसी दिग्गज खिलाड़ियों ने दो दशकों से अधिक समय तक अपने शानदार प्रदर्शन से इस खेल की नींव को मजबूत किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। आज भारतीय महिला टीम विश्व क्रिकेट की सबसे ताकतवर और प्रतिस्पर्धी टीमों में गिनी जाती है। अंडर-19 विश्व कप की खिताबी जीत और वैश्विक टूर्नामेंट्स में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन यह गवाही देते हैं कि 1970 के दशक में लखनऊ और पुणे की पटरियों से शुरू हुआ यह सफर आज बुलंदियों को छू रहा है।