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बिहार में जब भी साफ-सफाई की बात आती है, तो जेहन में एक ही सवाल कौंधता है कि क्या हम वाकई बदल रहे हैं? जवाब है—हाँ। 'स्वच्छता सर्वेक्षण 2024-25' के आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी हकीकत को तौलें, तो सुपौल ने एक बार फिर बाजी मारते हुए खुद को बिहार का सबसे साफ शहर साबित किया है। हालांकि, पटना और मुंगेर जैसे बड़े नाम अपनी रैंकिंग सुधारने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, लेकिन छोटे शहरों ने अपनी सामुदायिक भागीदारी से बाजी पलट दी है।
बिहार की बदलती सूरत: कचरे के अंबार से सस्टेनेबिलिटी तक का सफर
इतिहास गवाह है कि बिहार की छवि धूल-धूसरित गलियों और अव्यवस्थित शहरीकरण की रही है। लेकिन पिछले पांच वर्षों में एक मौन क्रांति हुई है। यह सिर्फ झाड़ू लगाने की बात नहीं है; यह अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) के बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने की जद्दोजहद है। राज्य के नगर विकास एवं आवास विभाग ने 'लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान' के तहत जिस तरह से कचरा पृथक्करण (Segregation) पर जोर दिया, उसका असर अब धरातल पर दिखने लगा है।
लेकिन क्या यह काफी है? बिल्कुल नहीं। बिहार के शहरों के साथ सबसे बड़ी चुनौती उनकी जनसंख्या घनत्व (Population Density) है। जब हम इंदौर या सूरत की तुलना बिहार के शहरों से करते हैं, तो हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि यहाँ की भौगोलिक और सामाजिक संरचना बिल्कुल अलग है। यहाँ का "सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट" मॉडल अब "डंपिंग यार्ड" से हटकर "रीसाइक्लिंग यूनिट्स" की तरफ मुड़ रहा है। मुजफ्फरपुर जैसे शहरों ने कचरे से खाद बनाने के अपने स्थानीय मॉडल से पूरे देश का ध्यान खींचा है, जो यह दर्शाता है कि इच्छाशक्ति हो तो कूड़े के पहाड़ भी सोने की खान बन सकते हैं।
सफाई की कसौटी: आखिर सुपौल और मुंगेर ही क्यों बाजी मारते हैं?
यह महज इत्तेफाक नहीं है कि सुपौल लगातार स्वच्छता की रैंकिंग में ऊपर बना हुआ है। इसके पीछे एक गहरा 'माइक्रो-प्लानिंग' का हाथ है। विशेषज्ञों की मानें तो छोटे शहरों में 'डोर-टू-डोर' कचरा उठाव की निगरानी करना बड़े महानगरों की तुलना में कहीं अधिक सरल है। सुपौल में गीले और सूखे कचरे के अलगाव का प्रतिशत 90% से ऊपर पहुंच चुका है, जो पटना जैसे बड़े शहरों के लिए आज भी एक सपना बना हुआ है।
विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि स्वच्छता का पैमाना सिर्फ सड़कों की सफाई नहीं, बल्कि "ओडीएफ प्लस प्लस" (ODF++) की स्थिति भी है। बिहार के गंगा किनारे बसे शहरों, जिन्हें 'गंगा टाउन' कहा जाता है, में मुंगेर और बेगूसराय ने जल निकासी और नालों के पानी को सीधे गंगा में गिरने से रोकने के लिए जो 'एसटीपी' (Sewage Treatment Plant) लगाए हैं, उन्होंने उनकी रैंकिंग को एक नई ऊंचाई
स्वच्छता सर्वेक्षण में सफल होने के टिप्स और सामान्य गलतियाँ
बिहार के शहरों के लिए स्वच्छता रैंकिंग में सुधार करना एक बड़ी चुनौती रही है। अक्सर देखा गया है कि नगर निगम कचरा संग्रहण (Waste Collection) पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन कचरा प्रसंस्करण (Waste Processing) में पिछड़ जाते हैं। सबसे बड़ी गलती यह होती है कि कचरे का पृथक्करण (Segregation) स्रोत पर नहीं किया जाता। यदि गीला और सूखा कचरा घर से ही अलग न हो, तो उसे रीसायकल करना लगभग असंभव हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, शहरों को केवल मशीनों पर निर्भर रहने के बजाय जनभागीदारी (Public Participation) पर जोर देना चाहिए। पटना और गया जैसे शहरों के अनुभव बताते हैं कि जब तक नागरिक सड़क पर कचरा न फेंकने की जिम्मेदारी नहीं लेंगे, तब तक स्थायी स्वच्छता संभव नहीं है। शहरों को 'जीरो वेस्ट मॉडल' की ओर बढ़ना चाहिए, जहाँ कचरे से खाद या ऊर्जा का निर्माण हो सके। साथ ही, प्लास्टिक प्रतिबंध का कड़ाई से पालन और सार्वजनिक शौचालयों का नियमित रखरखाव रैंकिंग सुधारने के लिए अनिवार्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. बिहार का सबसे साफ शहर वर्तमान में कौन सा है?
नवीनतम स्वच्छता सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, पटना और गया बिहार के सबसे अग्रणी शहरों में शामिल हैं। गया को अक्सर अपनी बेहतर वेस्ट मैनेजमेंट प्रणाली के लिए राज्य में सर्वोच्च स्थान मिलता रहा है, जबकि पटना ने कचरा उठाने की अपनी आवृत्ति में काफी सुधार किया है।
2. स्वच्छता रैंकिंग किस आधार पर तय की जाती है?
यह रैंकिंग मुख्य रूप से तीन मानकों पर आधारित होती है: सेवा स्तर की प्रगति (Service Level Progress), प्रमाणन (Certification) जैसे कि ओडीएफ+ स्टेटस, और सबसे महत्वपूर्ण नागरिकों की प्रतिक्रिया (Citizen Feedback)। इसमें कचरे का पृथक्करण और प्रसंस्करण सबसे अधिक अंक वाला हिस्सा होता है।
3. बिहार के शहरों की रैंकिंग राष्ट्रीय स्तर पर कम क्यों रहती है?
इसके पीछे मुख्य कारण जनसंख्या का घनत्व, बुनियादी ढांचे की कमी और कचरा डंपिंग साइट्स का अभाव है। हालांकि, 'स्मार्ट सिटी मिशन' और 'स्वच्छ भारत अभियान 2.0' के तहत अब बिहार के शहरों में अत्याधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट लगाए जा रहे हैं, जिससे भविष्य में सुधार की पूरी उम्मीद है।
संपादकीय निर्णय (Editorial Verdict)
बिहार में स्वच्छता की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। हालांकि आंकड़ों में कभी गया तो कभी पटना बाजी मारता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि स्वच्छता केवल एक सरकारी आंकड़े का विषय नहीं है। हमारे विचार में, गया ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद जिस तरह से 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल को अपनाया है, वह अन्य जिलों के लिए प्रेरणादायक है। यदि बिहार के अन्य नगर निकाय नागरिक जागरूकता और तकनीकी समाधान का सही संतुलन बना लें, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार का कोई शहर राष्ट्रीय स्तर पर टॉप 10 में अपनी जगह बनाएगा।
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