सीधा जवाब यह है कि चीन केवल 'बड़ा' है, 'विकसित' नहीं। दुनिया बीजिंग की गगनचुंबी इमारतों और शंघाई की चकाचौंध देखकर धोखा खा जाती है, लेकिन असलियत वर्ल्ड बैंक के उन पैमानों में छिपी है जो प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास सूचकांक को तवज्जो देते हैं। चीन की जीडीपी का आकार भले ही अमेरिका को टक्कर दे रहा हो, लेकिन जब आप उस दौलत को 1.4 अरब की आबादी में बांटते हैं, तो वह एक औसत मध्यम-आय वाले देश से ज्यादा कुछ नहीं बचता।

आर्थिक चक्रव्यूह और विकास की परिभाषा का विरोधाभास

विकसित राष्ट्र होने का मतलब सिर्फ रॉकेट छोड़ना या बुलेट ट्रेन चलाना नहीं होता। इसके लिए एक ऐसी सस्टेनेबल इकोनॉमी चाहिए जहां समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की क्रय शक्ति और जीवन स्तर यूरोपीय मानकों के समकक्ष हो। चीन के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने विकास का 'टॉप-डाउन' मॉडल अपनाया है। सरकार के पास अथाह पैसा है, उसकी कंपनियां दुनिया भर के बंदरगाह खरीद रही हैं, लेकिन घरेलू मोर्चे पर तस्वीर धुंधली है। चीन की प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) अभी भी उस जादुई आंकड़े से कोसों दूर है जिसे 'हाई-इनकम इकोनॉमी' कहा जाता है।

ऐतिहासिक रूप से, चीन ने खुद को 'दुनिया के कारखाने' के रूप में स्थापित किया। सस्ती मजदूरी और बड़े पैमाने पर विनिर्माण ने उसे धनवान तो बनाया, लेकिन इस प्रक्रिया में वह 'मिडल इनकम ट्रैप' में फंस गया। यह एक ऐसी स्थिति है जहां एक देश गरीब से मध्यम वर्ग तक तो तेजी से पहुंचता है, लेकिन नवाचार और संस्थागत सुधारों की कमी के कारण वहां से विकसित देशों की श्रेणी में छलांग नहीं लगा पाता। चीन की पूरी व्यवस्था आज भी भारी कर्ज और रियल एस्टेट के ढहते बुलबुले पर टिकी है, जो किसी भी परिपक्व विकसित अर्थव्यवस्था की निशानी नहीं हो सकती।

गहरी असमानता और क्षेत्रीय खाई का विश्लेषण

चीन को एक इकाई के रूप में देखना सबसे बड़ी विश्लेषणात्मक भूल है। हकीकत में, वहां 'दो चीन' बसते हैं। एक वह जो पूर्वी तट पर स्थित है—शंघाई, शेन्ज़ेन और बीजिंग—जो आधुनिकता में न्यूयॉर्क को मात देते हैं। दूसरा वह जो ग्रामीण और पश्चिमी प्रांतों में है, जहां की गरीबी और बुनियादी ढांचे की हालत किसी पिछड़े अफ्रीकी देश जैसी है। विकसित देशों में विकास का प्रसार कमोबेश समान होता है, लेकिन चीन में हुकौ (Hukou) प्रणाली ने एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है जिसने ग्रामीण आबादी को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया है।

यह ढांचागत असमानता चीन के विकसित होने के दावों की धज्जियां उड़ा देती है। लाखों प्रवासी मजदूर जो शहरों का निर्माण करते हैं, उन्हें वहां के स्वास्थ्य और शिक्षा लाभ नहीं मिलते। जब तक एक विशाल आबादी शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में पिछड़ी रहेगी, तब तक 'विकसित' शब्द का लेबल लगाना केवल एक कूटनीतिक हथकंडा है। चीन जानबूझकर खुद को 'विकासशील' बनाए रखना चाहता है ताकि उसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और जलवायु समझौतों में रियायतें मिलती रहें, लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि उसके पास अभी भी करोड़ों ऐसे लोग हैं जो रोजाना चंद डॉलरों पर गुजारा करते हैं।

संस्थागत विफलताएं और व्यावहारिक निहितार्थ

एक विकसित समाज की पहचान उसकी स्वतंत्र न्यायपालिका, कानून का शासन और पारदर्शी बैंकिंग प्रणाली से होती है। चीन में यह सब कुछ कम्युनिस्ट पार्टी की इच्छाशक्ति के अधीन है। जब जैक मा जैसे उद्योगपति गायब हो सकते हैं और रातों-रात पूरे टेक सेक्टर को सरकारी डंडे से कुचला जा सकता है, तो वह बाजार की परिपक्वता नहीं बल्कि तानाशाही अस्थिरता है। निवेशक ऐसी जगहों को विकसित नहीं मानते जहां संपत्ति के अधिकार और बौद्धिक संपदा की सुरक्षा राजनीतिक मूड पर निर्भर करती हो।

इसके व्यावहारिक निहितार्थ भयानक हैं। चीन की जनसांख्यिकीय गिरावट (Demographic Decline) उसे विकसित होने से पहले ही बूढ़ा बना रही है। एक विकसित देश अपनी उत्पादकता और नवाचार से श्रम शक्ति की कमी को पूरा करता है, लेकिन चीन अभी भी श्रम-प्रधान मॉडल से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है। सामाजिक सुरक्षा का अभाव और स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी खर्च के डर से चीन का नागरिक पैसा बचाने पर मजबूर है, जिससे घरेलू खपत बढ़ नहीं पा रही। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसने चीन की आर्थिक रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है, और फिलहाल वह विकसित देशों के क्लब का दरवाजा खटखटाने की स्थिति में नहीं दिखता।

विकास की राह में प्रमुख बाधाएं और विशेषज्ञ सुझाव

चीन की आर्थिक उन्नति के बावजूद इसे 'विकसित' श्रेणी में शामिल न कर पाने के पीछे कुछ मौलिक कारण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) का कम होना सबसे बड़ी बाधा है। चीन की कुल जीडीपी विशाल है, लेकिन 1.4 अरब की जनसंख्या के कारण औसत नागरिक की आय पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम है।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय असमानता है। शंघाई और बीजिंग जैसे शहर विकसित दिखते हैं, लेकिन ग्रामीण आंतरिक भाग अभी भी गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन को यदि विकसित बनना है, तो उसे 'मिडल इनकम ट्रैप' से बचना होगा। इसके लिए केवल विनिर्माण (Manufacturing) पर निर्भर रहने के बजाय नवाचार और सेवा क्षेत्र में गुणात्मक सुधार करना आवश्यक है। साथ ही, चीन की तेजी से बूढ़ी होती जनसंख्या श्रम शक्ति पर दबाव डाल रही है, जिसे संतुलित करना एक बड़ी चुनौती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या चीन 2030 तक विकसित देश बन सकता है?

विश्व बैंक के मानकों के अनुसार, उच्च-आय वाले देशों की श्रेणी में आने के लिए चीन को अपनी प्रति व्यक्ति आय में निरंतर वृद्धि करनी होगी। हालांकि चीन तकनीक में आगे है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा और मानवाधिकारों के वैश्विक मानकों को पूरा करना भी विकसित राष्ट्र का पैमाना है, जिसमें अभी समय लग सकता है।

2. चीन खुद को 'विकासशील' क्यों बनाए रखना चाहता है?

विकासशील देश होने के नाते चीन को विश्व व्यापार संगठन (WTO) और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्यापारिक छूट, कम ब्याज दर पर ऋण और पर्यावरण संबंधी नियमों में लचीलापन मिलता है। विकसित घोषित होने पर उसे ये विशेष लाभ छोड़ने पड़ेंगे।

3. विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच मुख्य अंतर क्या है?

मुख्य अंतर केवल जीडीपी नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और मानव विकास सूचकांक (HDI) है। चीन इन पैमानों पर अभी भी नॉर्वे या अमेरिका जैसे देशों से काफी पीछे है।

संपादकीय निर्णय (निष्कर्ष)

चीन एक 'आर्थिक महाशक्ति' तो है, लेकिन 'विकसित राष्ट्र' कहलाने के लिए उसे अपनी आंतरिक असमानताओं और लोकतांत्रिक पारदर्शिता की कमी को दूर करना होगा। मेरा मानना है कि केवल ऊँची इमारतों और बुलेट ट्रेनों से कोई देश विकसित नहीं होता; विकास का असली पैमाना समाज के सबसे निचले स्तर पर रहने वाले व्यक्ति की स्वतंत्रता और समृद्धि है। चीन वर्तमान में एक संक्रमण काल से गुजर रहा है, जहाँ वह विकासशील और विकसित देशों के बीच की धुंधली रेखा पर खड़ा है।