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स्मार्टफोन के नाम पर आज हमारे जेहन में एप्पल या सैमसंग की तस्वीर उभरती है, लेकिन हकीकत में दुनिया का पहला स्मार्टफोन आईबीएम (IBM) ने बनाया था। 1992 में पेश किए गए इस उपकरण का नाम 'IBM Simon Personal Communicator' था। हालांकि उस दौर में 'स्मार्टफोन' शब्द का ईजाद नहीं हुआ था, लेकिन साइमन ने वे तमाम काम कर दिखाए थे जो आज के आधुनिक हैंडसेट करते हैं। यह मात्र एक फोन नहीं, बल्कि भविष्य की एक धुंधली मगर क्रांतिकारी झलक थी।
तकनीकी विकास की बुनियाद और साइमन का उदय
नब्बे के दशक की शुरुआत में जब लोग पेजर और भारी-भरकम सेल्युलर फोन के बीच तालमेल बिठाने की जद्दोजहद में मशगूल थे, तब आईबीएम और मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक ने एक ऐसी मशीन की कल्पना की जो कंप्यूटर की बुद्धिमत्ता को टेलीफोन की पोर्टेबिलिटी के साथ नत्थी कर दे। 23 नवंबर, 1992 को लास वेगास के 'कॉमडेक्स' (COMDEX) ट्रेड शो में जब 'एंग्लर' नामक इस प्रोटोटाइप को दुनिया के सामने रखा गया, तो वहां मौजूद इंजीनियरों के होश फाख्ता हो गए। यह कोरी कल्पना नहीं, बल्कि सिलिकॉन और सर्किट का एक ऐसा मेल था जिसने संचार की परिभाषा बदलने की कसम खाई थी।
उस दौर के पुराने टेलीफोन केवल आवाज को एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाने का जरिया थे। मगर आईबीएम साइमन ने इस जंजीर को तोड़ दिया। इसमें न तो कोई फिजिकल कीपैड था और न ही कोई रोटरी डायल। इसके बजाय, इसमें एक लंबी प्रेशर-सेंसिटिव एलसीडी टचस्क्रीन थी, जिसे चलाने के लिए स्टाइलस की जरूरत पड़ती थी। सोचिए, 1992 में टचस्क्रीन! यह विचार अपने आप में इतना दुस्साहसी था कि कई आलोचकों ने इसे 'समय से बहुत आगे की विफलता' करार दे दिया था। लेकिन इतिहास गवाह है कि इसी 'विफलता' ने आज की खरबों डॉलर की स्मार्टफोन इंडस्ट्री की नींव रखी।
सटीक विश्लेषण: क्या वाकई साइमन एक 'स्मार्ट' फोन था?
आज के दौर के स्नैपड्रैगन प्रोसेसर और एमोलेड डिस्प्ले के चश्मे से देखेंगे तो साइमन आपको एक काला ईंट जैसा लगेगा, जिसका वजन लगभग आधा किलो (510 ग्राम) था। लेकिन इसके भीतर छिपी तकनीक उस समय के हिसाब से किसी चमत्कार से कम नहीं थी। इसमें 16 मेगाहर्ट्ज का प्रोसेसर था और महज 1 मेगाबाइट की रैम। आज यह आंकड़े हास्यास्पद लग सकते हैं, लेकिन उस कालखंड में एक हाथ में पकड़े जाने वाले यंत्र में इतनी शक्ति होना विज्ञान फंतासी जैसा था।
साइमन की खासियत सिर्फ कॉल करना नहीं थी। यह फैक्स भेज सकता था, ईमेल पढ़ सकता था और इसमें एक 'प्रेडिक्टिव कीबोर्ड' भी था—जी हां, वही तकनीक जिसे हम आज ऑटो-करेक्ट के रूप में जानते हैं। इसमें कैलेंडर, एड्रेस बुक, वर्ल्ड क्लॉक और नोटपैड जैसे ऐप्स पहले से इंस्टॉल थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इसमें एक पीसी कार्ड स्लॉट था, जिसके जरिए थर्ड-पार्टी ऐप्स डाले जा सकते थे। यहीं से 'ऐप कल्चर' की असली शुरुआत हुई। आईबीएम ने एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश की थी जहाँ हार्डवेयर सिर्फ एक जरिया था, और असली ताकत सॉफ्टवेयर के पास थी।
व्यावहारिक निहितार्थ और बाजार का कड़वा सच
जब 1994 में बेलसाउथ सेल्युलर ने इसे बाजार में उतारा, तो इसकी कीमत 899 डॉलर रखी गई थी—दो साल के अनुबंध के साथ। आज की मुद्रास्फीति के हिसाब से यह रकम करीब 1800 डॉलर से ऊपर बैठती है। इतनी भारी कीमत और बैटरी का महज एक घंटे तक टिक पाना इसके व्यावसायिक पतन का मुख्य कारण बना। उपभोक्ता अभी इस तरह की 'ऑल-इन-वन' डिवाइस के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। लोग मोबाइल को सिर्फ बात करने का जरिया समझते थे, न कि अपनी जेब में रखा जाने वाला दफ्तर।
साइमन की सीमित उपलब्धता—सिर्फ अमेरिका के 15 राज्यों में—ने भी इसकी पहुंच को सीमित कर दिया। कुल 50,000 यूनिट्स बिकने के बाद इसे बाजार से हटा लिया गया। मगर इसकी विफलता ने एक कड़वा लेकिन जरूरी सबक सिखाया: 'नवाचार केवल विचार में नहीं, बल्कि उपयोगिता और सुलभता के संतुलन में होता है।' साइमन ने साबित कर दिया कि मोबाइल फोन सिर्फ बात करने के लिए नहीं है, बल्कि यह डेटा प्रोसेसिंग का एक शक्तिशाली केंद्र बन सकता है। इसी सीख ने आगे चलकर नोकिया के सिम्बियन और अंततः ब्लैकबेरी के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
सामान्य गलतियाँ और विशेषज्ञ युक्तियाँ
स्मार्टफोन के इतिहास को समझते समय सबसे बड़ी गलती Simon Personal Communicator को नजरअंदाज करना है। कई लोग गलती से एप्पल के 'आईफोन' को पहला स्मार्टफोन मान
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