ईश्वर मनुष्य को कहाँ ढूँढ़ता है?
हम अक्सर ईश्वर को मंदिर, मस्जिद, काबा या फिर कैलाश जैसे पवित्र स्थानों में ढूँढ़ते रहते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि वास्तव में ईश्वर मनुष्य को कहाँ ढूँढ़ता है? जब हम पत्थर के मंदिरों में उसकी मूर्ति के आगे झुकते हैं, तब वह हमारे भीतर के उस अनुभव को देख रहा होता है जहाँ प्रेम, भक्ति और विनम्रता का संगम होता है।
ईश्वर मनुष्य को उसके हृदय में ढूँढ़ता है—वहाँ, जहाँ डर और आशा, पाप और प्रार्थना, गहरे सवाल और मौन के जवाब छिपे होते हैं। वह उस आँख में झांकता है जो आंसुओं से भरी हो, उस हाथ में छूता है जो दूसरों की मदद के लिए बढ़ाया गया हो।
हम ऊँचे-ऊँचे गुंबदों और बर्फ़ीले शिखरों की ओर दौड़ते हैं, लेकिन वह उन छोटे पलों में खोजा जाता है—जब कोई बूढ़ा व्यक्ति भगवान का नाम लेकर मुस्कुराता है, जब कोई बच्चा निश्छलता से प्रार्थना करता है, जब कोई टूटा हुआ दिल बिना शब्दों के उस तक पहुँचना चाहता ह
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