तीसरा सप्तक: प्रयोगवादी काव्यधारा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव

हिंदी साहित्य के इतिहास में सप्तक परंपरा का एक विशेष स्थान रहा है। आधुनिक हिंदी कविता को एक नई दिशा और नया रूप देने में इसका योगदान अतुलनीय है। जब प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय') ने नए कवियों और उनके नए प्रयोगों को एक मंच देने का बीड़ा उठाया, तो 'सप्तक' का जन्म हुआ।

इसी क्रम में तीसरा सप्तक का प्रकाशन वर्ष 1959 ई० में भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन द्वारा किया गया था। अज्ञेय द्वारा संपादित इस संकलन ने नई कविता के दौर को और अधिक समृद्ध बनाया। इसमें सात प्रमुख कवियों की रचनाओं को शामिल किया गया था, जिन्होंने अपनी संवेदनशील और नवीन दृष्टि से हिंदी साहित्य को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।

तीसरा सप्तक में संकलित सात प्रमुख कवि निम्नलिखित हैं:

1. कुँवर नारायण
2. कीर्ति चौधरी
3. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
4. मदन वात्स्यायन
5. प्रयाग नारायण त्रिपाठी
6. केदारनाथ सिंह
7. विजयदेव नारायण साही

इन कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भाषा, प्रतीक और बिंबों के नए प्रयोग किए। तीसरा सप्तक केवल कविताओं का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रयोगवाद और नई कविता के दौर की सामाजिक, व्यक्तिगत और वैचारिक चेतना का एक जीवंत दस्तावेज है।

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