धारा 345 भारतीय दंड संहिता: सदोष परिरोध और कानूनी जारी रिट
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 345 एक ऐसे गंभीर अपराध से संबंधित है, जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी को गैरकानूनी तरीके से बंद रखता है।
विशेष रूप से, यह धारा तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति जानते हुए भी किसी अन्य व्यक्ति को तब तक रोके रखता है, जबकि उसके छूटने के लिए न्यायालय द्वारा रिट जारी की जा चुकी हो। रिट एक संवैधानिक या कानूनी आदेश होता है, जिसके तहत न्यायालय किसी बंद व्यक्ति को मुक्त करने का आदेश देता है। इसमें सबसे आम रिट हेबियस कॉर्पस होती है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से नजरबंद किया गया है और उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट ने उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है, लेकिन फिर भी उसे बंद रखा जाता है, तो ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति या अधिकारी उसके मुक्त होने में बाधा डाल रहा होता है, वह धारा 345 के तहत दंडनीय होता है।
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