माँ के प्रेम से बड़ा कोई प्रेम नहीं
क्या कोई माँ से ज्यादा प्यार कर सकता है? इस सवाल का जवाब देते हुए एक बुजुर्ग ने कहा था — "कदापि नहीं वत्स।" और सच कहें तो यही सच्चाई है। माँ का प्रेम इतना निष्कलंक, निस्वार्थ और अटूट होता है कि इसे मापा नहीं जा सकता।
चाहे वह पहली बार की मुस्कान हो या पहली बार बोलने का पल, हर पल में माँ की छाया होती है। वह बिना किसी शर्त के अपने बच्चे के लिए जीती है, सोचती है, तपती है। उसका प्यार ऐसा स्रोत है जो कभी सूखता नहीं। वह अपने बच्चे के आँसू पोंछती है, बिना खुद रोए। उसकी चिंता में नींद टूटती है, लेकिन बच्चे के मुस्कुराने पर सब भूल जाती है।
हम जितना भी बड़े हो जाएँ, माँ के लिए हम हमेशा बच्चे रहते हैं। उसकी आँखों में हमारी छवि कभी बदलती नहीं। वह वही छोटा सा बच्चा रहता है जिसे वह पहली बार गोद में लेकर रोई थी। इस प्रेम का स्तर इतना ऊँचा है कि इसे किसी अन्य रिश्ते से तुलना करना असंभव है।
माँ का प्यार भगवान की कृपा
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