पिता के प्रति पुत्र का कर्तव्य
पिता बच्चे के जीवन में सबसे पहले गुरु और आदर्श होते हैं। उनके प्रति पुत्र का कर्तव्य केवल सम्मान दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरी भावनात्मक जिम्मेदारी है। जैसे बचपन में पिता अपने बच्चे को स्नान कराते हैं, उसे खाना खिलाते हैं, उसकी घुलनी करते हैं, वैसे ही जब वे बुढ़ापे में कमजोर हो जाते हैं, तो पुत्र को उनकी छोटी-छोटी आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए।
उन्हें स्नान कराना, खाना खिलाना, उनके सोने-जागने का ध्यान रखना—ये सभी छोटे-छोटे काम विशेष भावना से भरे होने चाहिए। जब पिता सोये हों, तो उनकी चरण-सेवा करना, सुबह उठते ही मधुर स्वर में उन्हें जगाना और तुरंत चरणों में नमस्कार करना—ये सब न केवल धार्मिक अनुष्ठान हैं, बल्कि प्रेम और कृतज्ञता के भाव को व्यक्त करने के तरीके भी हैं।
आज की व्यस्त दुनिया में अक्सर हम इन सरल नियमों को भूल जाते हैं। लेकिन वास्तव में, यही छोटे काम पिता-पुत्र के रिश्ते को मजबूत बनात
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