गुरु की सेवा कैसे करें?
गुरु की सेवा केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि हृदय से जुड़ी एक भावना है। जब कोई पूछता है कि गुरु की सेवा कैसे करनी चाहिए, तो सच्चाई यह है कि वह बिना सोचे-समझे गुरु के आदेश का पालन करना है।
गुरुभक्ति का मूल मंत्र है – श्रद्धा और आज्ञापालन। जो काम गुरु आज्ञा दें, उसे पूरे मन से, बिना झिझक और संदेह के करना चाहिए। और जिस काम को वे न करने को कहें, उसे बिलकुल नहीं करना चाहिए। यहाँ छोटी-सी बुद्धि के तर्क-वितर्क को कोई स्थान नहीं है।
अक्सर हम अपनी सीमित समझदारी में फंसकर गुरु के आदेश पर सवाल उठाने लगते हैं। लेकिन गुरु की दृष्टि गहरी होती है। वह जो कहते हैं, उसके पीछे अक्सर एक बड़ा उद्देश्य होता है, जो हमारी छोटी समझ से परे होता है।
इसलिए, गुरु की सेवा का असली तात्पर्य है – अपने अहंकार को त्यागकर, श्रद्धा से उनके चरणों में झुक जाना। जब हम बिना शर्त उनकी आज्ञा मानते हैं, तो वही भक्ति और सेवा का ऊँचा रूप बन जाता है।
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