शरीर और आत्मा को पवित्र कैसे करें?
हम सभी कभी न कभी सोचते हैं कि शरीर और मन दोनों को वास्तविक अर्थ में पवित्र कैसे बनाया जाए। शास्त्रों में इसके लिए एक सुंदर मंत्र बताया गया है – “ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभंतर: शुचि:।”
इस मंत्र का अर्थ सरल और गहरा है। चाहे व्यक्ति शारीरिक रूप से पवित्र हो या अपवित्र, चाहे किसी भी स्थिति में हो, जो भगवान पुण्डरीकाक्ष (भगवान विष्णु) का नाम लेता है, वह बाहर और भीतर से शुद्ध हो जाता है।
इस बात का गहरा संदेश यह है कि सच्ची पवित्रता बाहरी नहाने-धोने से नहीं, बल्कि हृदय में ईश्वर के प्रति भाव से आती है। नियमित स्नान तो शारीरिक स्वच्छता के लिए आवश्यक है, लेकिन आंतरिक शुद्धि के लिए मन को भगवान के नाम से जोड़ना ज़रूरी है।
इस मंत्र का उच्चारण करते हुए स्नान करने से न सिर्फ़ शरीर, बल्कि मन भी प्रसन्न और शांत होता है। यह एक साधारण प्रथा हो सकती है, लेकिन इसके प्रभाव गहरे ह
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