पवित्र होने का मंत्र: एक आध्यात्मिक साधन

धार्मिक ग्रंथों में पवित्रता को न केवल शारीरिक शुद्धता, बल्कि मन और आत्मा की स्वच्छता के रूप में देखा गया है। ऐसे में कई लोग जानना चाहते हैं कि पवित्र होने के लिए कौन-सा मंत्र है। शास्त्रों के अनुसार, इसके लिए प्रसिद्ध है स्नान मंत्र

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभंतर: शुचि:।।

इस मंत्र का अर्थ गहरा है। यह कहता है कि कोई भी व्यक्ति चाहे जिस स्थिति में क्यों न हो—पवित्र हो या अपवित्र, शुद्ध हो या अशुद्ध—अगर वह भगवान विष्णु, जिन्हें 'पुण्डरीकाक्ष' कहा जाता है, का स्मरण करता है, तो वह बाहर और भीतर से शुद्ध हो जाता है।

यह मंत्र सिर्फ स्नान के समय ही नहीं, बल्कि जीवन के हर पल में मन को पवित्र रखने की प्रेरणा देता है। यह याद दिलाता है कि सच्ची पवित्रता बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि भगवान के चरणों में मन की लगन और स्मरण से आती है।

इस मंत्र को धीरे-धीरे जपने से मन शांत हो

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