अकबर के दरबार में ख्वाजा सरा और बीरबल की बहार

मुगल बादशाह अकबर के दरबार में एक बार एक विद्वान ख्वाजा सरा आए। वे अपनी विद्या पर इतने गर्व करते थे कि अपने आप को दरबार के सबसे बड़े ज्ञानी में से एक समझते थे। लेकिन एक बात उन्हें परेशान करती थी — बीरबल।

ख्वाजा सरा बीरबल को मूर्ख और साधारण व्यक्ति समझते थे।

उनका मानना था कि बीरबल के पास न ज्ञान है, न तर्क की शक्ति। लेकिन दरबार में स्थिति बिल्कुल उलट थी। बीरबल की बातों पर अकबर को भरोसा होता था। उनकी चतुराई, समझदारी और कहानियाँ सबको पसंद आती थीं। जब बीरबल कुछ कहते, तो दरबार में सन्नाटा छा जाता। लेकिन जब ख्वाजा सरा बोलते, तो उनकी बात का असर वैसा होता, जैसे नक्कारखाने में तूती की आवाज़ — बिल्कुल नजरअंदाज।

यह कहानी न सिर्फ मनोरंजक है, बल्कि सीख भी देती है। घमंड चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंत में वास्तविक योग्यता का ताज उसी के सिर पर जाता है जिसमें सच्ची प्रतिभा होती है। बीरबल की जीत स

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