महाराण प्रताप के वीर सेनापति हकीम खां सूर
जब भी महाराणा प्रताप का नाम लिया जाता है, तो हल्दीघाटी का युद्ध सबसे पहले दिमाग में आता है। लेकिन उस ऐतिहासिक लड़ाई में महाराणा के साथ खड़ा एक ऐसा शूरवीर भी था, जिसकी वीरता ने अकबर की सेना को भी हिला दिया—वह थे हकीम खां सूर।
हकीम खां सूर सिर्फ एक सेनापति नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप के सच्चे साथी और दोस्त भी थे। वे उस युद्ध में इतना डटकर लड़े कि अंत तक तलवार हाथ में लिए मरे। उनकी वीरता के आगे अकबर की विशाल सेना भी कई कोस दूर भागने को मजबूर हो गई।
वीरता के साथ-साथ उनके प्रति सम्मान का भी अद्भुत उदाहरण है—जैसे वे जीवित थे, वैसे ही उन्हें अंतिम संस्कार के समय भी तलवार के साथ दफनाया गया। आज भी उदयपुर के आसपास उनकी यादगार और कहानियाँ लोगों के बीच जिंदा हैं।
हल्दीघाटी का इतिहास हकीम खां सूर के बिना अधूरा है। वे साबित कर गए कि वफादारी और बहादुरी कभी जाति या धर्म नहीं देखती।
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