मरता कौन है – शरीर या आत्मा?
हम सभी कभी न कभी सोचते हैं – मृत्यु किसकी होती है? क्या वाकई हम खत्म हो जाते हैं या कुछ बाकी रह जाता है? भारतीय दर्शन के अनुसार, मरता सिर्फ शरीर है, आत्मा नहीं। शरीर एक अस्थायी आवरण है, जैसे कोई पोशाक, जिसे पहना जाता है और फिर बदला जाता है।
आत्मा तो चैतन्य स्वरूप है – अर्थात वह स्थायी, अविनाशी और अजर-अमर है। गीता में भी कृष्ण कहते हैं कि आत्मा न तो जन्म लेती है, न मरती है। वह नाशवान देह का हिस्सा नहीं, बल्कि उसके परे की सत्ता है। जब शरीर कमजोर हो जाता है, उम्र या बीमारी के कारण काम करना बंद कर देता है, तब आत्मा उसे छोड़ देती है।
यह किसी बल्ब के बंद होने के समान है – बल्ब खराब हो सकता है, लेकिन बिजली तो अभी भी मौजूद रहती है। उसी तरह शरीर टूट जाता है, मगर आत्मा साक्षी की तरह बनी रहती है। कई धर्म और दार्शनिक विचारक इसी बात पर सहमत हैं कि मृत्यु केवल एक संक्रमण है, अंत नहीं।
इसलिए, मरता शरीर
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