कर्मों का फल: प्रकृति का नियम, न कोई दैवीय न्याय

कर्मों का फल कौन देता है? यह सवाल आज भी लाखों लोगों के मन में उठता है। कई लोग मानते हैं कि कोई परमात्मा हमारे सारे कर्मों का हिसाब रखता है और उचित समय पर फल देता है। लेकिन सच यह है कि कर्म का फल कोई बाहरी शक्ति नहीं देती। वह तो जीवन के स्वाभाविक नियम का हिस्सा है।

जैसे कि कहा गया है — जैसा करोगे, वैसा भोगोगे। अगर आप अच्छे काम करते हैं, तो परिणाम भी अच्छा ही आता है। यदि बुराई करते हो, तो उसका अंजाम भी बुरा ही होता है। इसमें किसी दैवीय न्याय की जरूरत नहीं। यह सिर्फ क्रिया और प्रतिक्रिया का सिद्धांत है, जैसे भौतिक जगत में हर क्रिया की एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

एक उदाहरण लीजिए — पक्का हुआ आम कभी कड़वा नहीं हो सकता। वह हमेशा मीठा ही रहता है। वैसे ही, अच्छे कर्म का परिणाम कभी बुरा नहीं हो सकता। वह अपने आप अच्छाई की ओर ले जाता है। इसलिए यह जरूरी नहीं कि हम किसी ऊपर बैठे न्यायकर्ता

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