धरती माता को प्रणाम: एक भावना, एक परंपरा
विष्णु-पत्नि नमस्तुभ्यं, पाद-स्पर्शं क्षमस्व मे – यह मंत्र केवल एक आह्वान नहीं, बल्कि धरती के प्रति गहरी श्रद्धा और विनम्रता का प्रतीक है। यह वही शब्द हैं जिन्हें कलाकार स्टेज पर अपनी कला प्रस्तुत करने से पहले धरती माता को समर्पित करते हैं।
धरती हमारी माँ है। वह चुपचाप हमें आसरा देती है, चलने का अधिकार देती है, और हमारे पाद-स्पर्श को क्षमा कर देती है। इस मंत्र के माध्यम से हम न केवल उनकी भौतिक उपस्थिति को सलाम करते हैं, बल्कि उनके अनंत सहनशीलता और प्रेम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में धरती को देवी के रूप में पूजा जाता रहा है। नृत्य, संगीत, नाटक – हर कला के शिल्पी अपनी पहली चाल या पहली ध्वनि से पहले धरती को छूकर नमन करते हैं। ये केवल रस्म नहीं, बल्कि परंपरा की गहराई है।
यह छोटी सी क्रिया बड़ा संदेश देती है – हम धरती पर नहीं, तो और कहाँ जिएंगे? इसलिए उसे छूकर प्रणाम करना
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