आत्मा का अंत कैसे होता है?

आत्मा का अंत नहीं होता — यह वेद, पुराण और भगवद गीता का स्पष्ट उपदेश है। जहाँ शरीर जन्मता है और मरता है, वहीं आत्मा न तो जन्मती है और न मरती है। वह अजर, अमर और शाश्वत है।

शरीर तो केवल एक आवरण है, जैसे कोई पुराने कपड़े बदल लेता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे में प्रवेश करती है। यह चक्र — जन्म, मृत्यु और फिर जन्म — तब तक चलता रहता है जब तक कि आत्मा को मोक्ष नहीं मिल जाता। मोक्ष वह अवस्था है जब आत्मा सभी भौतिक बंधनों से मुक्त हो जाती है और परमात्मा से एकाकार हो जाती है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि आत्मा न तो कट सकती है, न जल सकती है और न ही घट सकती है। यह शरीर से परे है। इसलिए, "आत्मा का अंत" का प्रश्न ही गलत है, क्योंकि अंत वहीं होता है जहाँ कोई आरंभ हो। और आत्मा का न आरंभ है, न अंत।

हमारा जीवन उस पवित्र यात्रा का हिस्सा है, जहाँ हर कर्म आत्मा के उत्थान में सहायक हो सकता है। ज्ञान, भक्ति औ

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