मृत्यु से डर क्यों नहीं?

मृत्यु जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा है। हर प्राणी जन्म लेता है और एक न एक दिन मृत्यु को भी स्वीकार करना पड़ता है। यह प्रकृति का नियम है। जैसे सूरज निकलता है और ढल जाता है, वैसे ही जीवन भी एक निश्चित समय तक रहता है। इसलिए मृत्यु से डरने की बजाय, जीवन को सार्थक बनाने पर ध्यान देना चाहिए

अगर हम अच्छे काम करते हैं, दूसरों की मदद करते हैं, सच्चाई और न्याय के लिए खड़े होते हैं, तो वो काम जीवन के बाद भी जीवित रहते हैं। महात्मा गांधी, भगत सिंह, रविंद्रनाथ टैगोर—ये सभी हमारे सामने नहीं हैं, लेकिन उनके कार्य आज भी हमें प्रेरित करते हैं।

जीवन अल्पकालिक है, लेकिन इसका असर स्थायी हो सकता है। इसलिए मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नए चक्र का हिस्सा समझें। भय के बजाय, जीवन के प्रति आभार और जिम्मेदारी महसूस करनी चाहिए। जब हम समझ लेते हैं कि हर पल अनमोल है, तो मौत का डर अपने आप घट जाता है।

सच्चा जीवन लंबाई में

यह भी देखें

विस्तृत लेख

संबंधित विषय