ईश्वर कहाँ ढूंढें?
ईश्वर को खोजने की थकान आज भी हजारों लोगों के चेहरे पर नजर आती है। कोई काशी के घाटों पर तपस्या करता है, तो कोई काबा के सामने आंखें बंद कर दुआएं मांगता है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे—जगहों की पवित्रता तो सच है, लेकिन क्या ईश्वर सिर्फ इन चार दीवारों में ही बसता है?
इंसान बाहर तो ढूंढता रहता है—मूर्तियों में, पत्थरों में, मीनारों में, लेकिन अपने दिल के भीतर की आवाज़ को भूल जाता है। एक कहावत है—“ईश्वर न आंखों से दिखाई देता है, बल्कि दिल से महसूस होता है।” जब तक हम खुद के भीतर नहीं झांकेंगे, तब तक दूर के तीर्थ भी निरर्थक लगेंगे।
कई ऋषि-मुनि जंगलों में बैठकर ईश्वर की खोज करते रहे, लेकिन अंत में उन्हें एहसास हुआ कि वह उनके अपने भीतर ही था। आज का मनुष्य मंदिर तक सीमित रह गया है, लेकिन आत्मा तक पहुँचने का साहस नहीं करता।
शायद इसीलिए कहा जाता है—ईश्वर को खोजने के लिए सबसे पहले खुद को ढूंढो। वह दूर नहीं
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