वेदों में मूर्ति पूजा पर प्रकाश
कई लोग मानते हैं कि मूर्ति पूजा प्राचीन वैदिक परंपरा का अहम हिस्सा है, लेकिन महर्षि दयानंद सरस्वती जैसे विद्वानों ने वेदों और शास्त्रों के आधार पर इसका खंडन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चारों वेदों में एक भी मंत्र नहीं है, जिससे मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जा सके या जिससे मूर्ति की पूजा का विधान मिले।
महर्षि दयानंद ने काशी शास्त्रार्थ में चालीस पौराणिक विद्वानों के सामने तर्क और शास्त्र प्रमाण देकर यह साबित किया कि वेद निराकार उपासना की बात करते हैं। उनके अनुसार, ईश्वर की उपासना नाम, ज्ञान और यज्ञ के माध्यम से होनी चाहिए, न कि मूर्ति के सामने दीप-धूप जलाकर।
यह बात भी ध्यान देने वाली है कि वैदिक काल में मंदिर या मूर्तियां नहीं थीं। यज्ञशाला और स्वाध्याय केंद्र थे, लेकिन मूर्ति पूजा का वैदिक धर्म में कोई आधार नहीं मिलता। बाद के युग में पौराणिक परंपराओं ने मूर्ति पूजा को लोकप्रिय बनाया, पर वेद उसका समर्थ
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।